“जनगणना २०२१” जैनों के समक्ष चुनौती

जनगणना २०२१ और जैनों के समक्ष चुनौती

              जनगणना का कार्य हर १० साल के अंतराल पर १८७२ से लगातार किया जा रहा है। २०२१ में होने वाली राष्ट्रीय जगगणना १८७२ के बाद इस अबाध  श्रृंखला की १६वीं जनगणना है। भारत की जनगणना का कार्य विश्व का सबसे बड़ा 35 समयबद्ध रूप से किया जाने वाला प्रशासनिक कार्य है। जनगणना में पूछे जाने वाले प्रश्नों को भारत सरकार एवं राज्य सरकार के राजपत्रों में भी प्रकाशित किया जाता है।  जनगणना में लोगों की भागीदारी से देश की अनेकता में एकता की भावना की झलक मिलती है। देश के भविष्य निर्माण में जनगणना के आँकड़ों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इन आँकड़ों के आधार पर ही योजनाओं का निर्माण और उनका क्रियान्वयन किया जाता है।

         जनगणना के आँकड़ों का विकास योजनाओं की समीक्षा के लिए बहुत उपयोग किया जाता है।  दिगंबर और श्वेताम्बर जैन समाज की राष्ट्रीय संस्थाएँ १९९१ से दावा करती आ रही हैं कि जैनों की जनसंख्या १ करोड़ से भी अधिक है किन्तु१९९१, २००१ और २०११ की जनगणनाओं और ३० वर्ष की लंबी अवधि व्यतीत होने के उपरांत अभी तक जैनों की संख्या आँकड़ों में एक करोड़ नहीं पहुँच पाई।

           शासकीय आँकड़ों में जैनों की संख्या कम होने का प्रमुख कारण यह है कि जनगणना प्रपत्र में धर्म के कॉलम में जैनों के द्वारा ध्यानपूर्वक नहीं भरा जाना है और गोत्र, उपजाति आदि को कुल नाम (सरनेम) के रूप में लिखना है, क्योंकि जैनों के कुलनाम हिन्दुओं से मिलते जुलते होते हैं इसलिए जनगणनाकर्ता कई बार बिना पूछे ही स्वयं धर्म के कॉलम में हिन्दू लिख देते हैं या फिर बहुत से जैन आज भी धर्म के रूप जैन धर्म को हिन्दू धर्म की शाखा मानने की भूल करते हैं। हमें इसे भूल को सुधारना होगा।  ऐसे आँकड़े मिलते हैं कि ८वीं शताब्दी के लगभग जैनों की संख्या लगभग ४ करोड़ थी और अकबर के समय यह जनसंख्या १ करोड़ थी, यह भी विचारणीय प्रश्न है कि हमारी जनसंख्या लगातार कम क्‍यों होती जा रही है।  मेरा मानना है कि जैन समाज में अपनी सही गणना हो इसके लिए जागरूकता के अत्यंत अभाव है। वर्ष २०१५ में आचार्य श्री १०८ विद्यासागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री १ ०८ प्रमाण सागर जी महाराज की प्रेरणा व नेतृत्व में जब सलेखना की परंपरा को बनाए रखने के लिए धर्म बचाओ आंदोलन चलाया गया था तब उस जनान्दोलन में अनुमानित ७६ लाख जैनों ने भाग लिया था तब एक आशा बंधी थी कि अभी भी भारतवर्ष में जैनों की जनसंख्या कम से कम १ करोड़ से अधिक है, पर इस आँकड़े को विश्व के सामने कैसे लाया जाए, यह आज की सबसे बड़ी चुनौती है, हम क्‍यों नहीं पंथ और संप्रदाय के मतभेदों से ऊपर उठकर इस विषय पर एक नहीं हो सकते हैं, आज यदि एक नहीं हो सके तो एक बात निश्चित है कि हमारे अस्तित्व पर भी पारसियों की तरह का संकट आ सकता है क्योंकि पारसी धर्म का अलग से उल्लेख जनगणना में नहीं किया जाता है।  लगभग डेढ़ वर्ष बचा हुआ है फरवरी २०२१ आने में, इसलिए सभी पंथों की राष्ट्रीय संस्थाओं को एक मंच पर आकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक रूप से विधिवत्‌ अभियान चलाना होगा, क्योंकि इस बार हम चूके तो पछताने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं बचेगा। 

          जनगणना प्रपत्र के छठवें कॉलम (धर्म में जैन लिखवाने का संदेश देश के हर कोने में बसे हर जैन परिवार तक पहुँचना चाहिए, हर नगर, गाँव, खेड़े, कॉलोनी की जैन पंचायत, मंदिर ट्रस्ट को इस अभियान में सक्रिय रूप से जोड़ना होगा ।  गर्व करो कि हमने जैन कुल में जन्म लिया है और हम पूरे गर्व के साथ बताएँगे भी कि हम जैन हैं। हमारा वैभवशाली इतिहास रहा है, तीर्थंकर महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के २५०० वर्ष बाद भी जैन धर्म की ध्वजा  निर्बाध रूप से लहरा रही है पर वर्तमान समय में सरकारी आँकड़ों में घटती जनसंख्या हमारे अस्तित्व के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।  हमें आपस के मतभेदों को भुलाकर अपने अस्तित्व के लिए जागना ही होगा और २०२१ की जनगणना में धर्म के कॉलम में जैन लिखवाना ही होगा अन्य कोई दूसरा विकल्प नहीं है। 

जो लोग अपने नाम के साथ उपनाम में जैन न लिखकर गोत्र-उपजाति आदि का उलेख करते हैं, सबसे पहले उन्हें चेतना होगा कि वे अपने नाम में जैन लिखना आरंभ करें तो यह चुनौती थोड़ी आसान हो सकती है।

 

प्रभातचन्द्र जैन 

 राष्ट्रीय अध्यक्ष 

 

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी 

www.tirthkshetracommittee.com


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