श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानंदजी महाराज के चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं महामंत्री  की  श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानंदजी की सल्लेखना समाधि पर  विनम्र श्रद्धांजलि

कर्नाटक के शेडवाल ग्राम में २२ अप्रैल १९२५ को जन्मे  बालक सुरेन्द्र कुमार, जो आगे जाकर ऐसे आचार्य बन गए, जिनके नाम से ही विद्या का स्मरण हो जाता है।

श्री कलप्पा उपाध्याय के घर में श्रीमती सरस्वती बाई की कुक्षी से जन्मे थे बालक सुरेन्द्र कुमार, २५ जुलाई १९६३ को आचार्य देशभूषण जी महाराज से आपने मुनि दीक्षा ली। आपकी तपस्या और आपकी साधना के कारण १९८७ में आपको आचार्य पद की प्राप्ति हुई। दिल्ली में आपने बहुत बार चौमासा कर के भारत की राजधानी में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार का कार्य किया, कुंदकुंद भारती जैसे उत्कृष्ट प्राकृत शोध संस्थान की स्थापना करवाई।

जब एक बार श्रावकों ने उनके कर कमलों में श्वेत मयूर पंखों से निर्मित पिच्छी समर्पित की थी, तब से आपको श्वेतपिच्छाचार्य के रूप में से जाना जाने लगा ।

जैन संतों का इस धरती पर होना बडे़ सौभाग्य की बात है, क्योंकि यदि जैन धर्म को सही अर्थों में समीचीन रूप से कोई पालन करता है तो वो जैन मुनि व आचार्य ही हैं, ऐसे जैन मुनियों व आचार्यों ने ही जैनधर्म की डोर को संभाले रखा है, वे ही जैन धर्म के जीवंत उदाहरण होते हैं ।

22 सितम्बर 2019 की रात्रि में आचार्यश्री विद्यानंद जी महाराज ने सल्लेखनापूर्वक समाधिमरण को प्राप्त किया है और इस प्रकार सम्पूर्ण जैन समाज ने एक महान आचार्य को खो दिया है, उनका शरीर भले ही नष्ट हो गया है पर वे सदैव हमारे बीच जीवंत रहेंगे और हम सब उनके बताए सत्य अहिंसा के मार्ग पर चलेंगे। पंचमकाल में ऐसे गुरुओं का सान्निध्य दुर्लभ है, सकल जैन समाज के लिए उनका चले जाना, एक बहुत बड़ी क्षति है| हम भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी मुम्बई परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं , उनकी आत्मा निकट भविष्य में मोक्ष रुपी लक्ष्मी को प्राप्त  हो, यही भावना भाते  हैं |

नमोस्तु सहित,

 

प्रभातचंद जैन                  राजेंद्र के.गोधा
राष्ट्रीय अध्यक्ष,           कर्याध्यक्ष एवं महामंत्री 

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी


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