राजगिर

नाम एवं पता

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र, राजगिर

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र, राजगिर पो. राजगिर,
जिला नालन्दा (बिहार)
पिन – 803116
फोन नं. – 06112-255235, 255783

राजगिर

क्षेत्र का महत्व एवं ऐतिहासिकता

यहाँ बीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रतनाथजी के गर्भ, जन्म, तप एवं ज्ञान कल्याणक हुए थे। यह भगवान महावीर स्वामी की प्रथम देशना स्थली है। यहाँ उनके 14 चातुर्मास हुए थे। भगवान महावीर का धर्मचक्र पर्वत प्रवर्तन क्षेत्र भी यही है। यहाँ स्थित विपुलाचल, रत्नगिरि, उदयगिरि, अरूणगिरि (स्वर्णगिरि) व वैभवगिरि आदि पाँच पहाड़ियों से अनेक मुनियों ने निर्वाण प्राप्त किया। इसी क्षेत्र से महावीर स्वामी के 11 गणधरों को भी मुक्ति मिली थी। इस प्रकार यह सिद्ध क्षेत्र है। विशेष जानकारी – राजगिर जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्मो का संगम स्थल है।

उपलब्ध सुविधाएं

श्री 1008 दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र

क्षेत्र पर उपलब्ध सुविधाएँ

आवास कमरे – 110, हाल – 2 (यात्री क्षमता – 55), यात्री ठहराने की कुल क्षमता – 1000, भोजनशाला – उपलब्ध हैं, औषधालय – उपलब्ध हैं, पुस्तकालय – उपलब्ध हैं, एस.टी.डी./पी.सी.ओ. – उपलब्ध हैं।,

आवागमन के साधन

रेल्वे स्टेशन – राजगिर – 1 कि.मी.।
बस स्टैण्ड – राजगिर।
पहुँचने का सरलतम मार्ग – गया या पटना से रेल द्वारा, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रं. 31 से नवादा, हिसुआ या बिहार शरीफ होकर सड़क मार्ग से।।

समीपस्थ तीर्थ क्षेत्र

कुण्डलपुर – 15 कि.मी., पावापुरी – 35 कि.मी., गुणावाँ – 40 कि.मी., गुलजार बाग (पटना) – 100 कि.मी.।

प्रबन्ध व्यवस्था

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र राजगिर (बिहार प्रान्त तीर्थक्षेत्र कमेटी), देवाश्रम महादेवा रोड, आरा
मंत्री – श्री अजयकुमार जैन (093343-96920)।

प्रबंधक -श्री सरोजकुमार जैन (06112-255235)

तीर्थक्षेत्र की वेबसाइट
भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी
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धर्मशाला आरक्षित करें
भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी
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तीर्थक्षेत्र के लिए दान करें
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निकटतम प्रमुख नगर:
बिहार शरीफ - 22 कि.मी., गया - 65 कि.मी., पटना - 100 कि.मी.।
प्रमुख विशेषताएँ
राजगिर जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्मो का संगम स्थल है।

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी का इतिहास

देश भर में दूरदूर तक स्थित अपने दिगम्बर जैन तीर्थयों की सेवा-सम्हाल करके उन्हें एक संयोजित व्यवस्था के अंतर्गत लाने के लिए किसी संगठन की आवश्यकता है , यह विचार उन्नीसवीं शताब्दी समाप्त होने के पूर्वसन् 1899 ई. में, मुंबई निवासी दानवीर, जैन कुलभूषण, तीर्थ भक्त, सेठ माणिकचंद हिराचंद जवेरी के मन में सबसे पहले उदित हुआ ।


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