सिद्ध क्षेत्र – सम्मेदशिखर जी

नाम एवं पता; संबद्धता क्र. 1 (अ)

सिद्धक्षेत्र, शाश्वत तीर्थराज श्रीसम्मेदशिखरजी

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र, सम्मेद शिखरजी

पता: पो. मधुबन, जिला – गिरिडीह (झारखण्ड)

 पिन – 825329

फोन नं.बीसपंथी कोठी – 06558-232228, 232209, 232361

सिद्ध क्षेत्र, सम्मेदशिखरजी

क्षेत्र का महत्व एवं ऐतिहासिकता

  • शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जैन समाज का पवित्रतम प्राचीन तीर्थक्षेत्र है। यहाँ से प्रत्येक काल की चौबीसी के सभी तीर्थंकर मोक्ष गए है। कालदोष के प्रभाव से वर्तमान युग के बीस तीर्थंकरों व अगणित मुनिराजों ने इस पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया है। मोक्ष स्थानों को इन्द्रदेव ने अपने मेरूदण्ड से चिन्हित कर दिया था। उन्हीं स्थानों पर चरणचिन्ह स्थापित कर उन पर टोंक बनी हुई है।
  • यह सम्मेद शिखर पर्वत 25 वर्गमील क्षेत्र में फैला है। इसकी ऊँचाई समुद्र तल से 1360 मीटर है। सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित है। 9 कि.मी. की यह पर्वतीय तीर्थ यात्रा मधुबन से प्रारंभ होती है तथा शिखर पर पूर्व की ओर 19 टोंको के दर्शन करते हुए जल मंदिर और वहां से पश्चिम की ओर 10 टोंको के दर्शन करते हुए पार्श्वनाथ टोंक पहुँचकर तीर्थयात्रा सम्पूर्ण होती है।
  • पारसनाथ स्टेशन से सम्मेदशिखर तीर्थयात्रा मार्ग का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-
  • ईसरी:-  यहाँ पारसनाथ स्टेशन के पास ईसरी में दो दिगम्बर जैन धर्मशालाएँ तेरापन्थी और बीसपन्थी बनी हुई है। तेरापन्थी धर्मशाला में एक शिखरबद्ध मन्दिर है। मूलनायक भगवान चन्द्रप्रभु की श्वेत पाषाण की पद्मासन प्रतिमा है। इसके अलावा दो पाषाण की तथा आठ धातु की प्रतिमाएँ है। मुख्य वेदी की परिक्रमा के पीछे एक ओर वेदी है जिसमें भगवान महावीर की रक्ताभ वर्ण पद्मासन प्रतिमा के अतिरिक्त 3 श्वेत पाषाण की प्रतिमाएँ है।
  • मधुबन:-  ईसरी से लगभग 2 कि.मी. पर मधुबन है। मधुबन पर्वत के उत्तरी भाग की ओर है। मधुबन में तेरापन्थी और बीसपन्थी दो कोठियाँ है। सम्मेदशिखर पर्वत की तलहटी में दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायों के मन्दिर है। सबसे पहले दिगम्बर जैन तेरापन्थी कोठी है, फिर श्वेताम्बर कोठी और सबसे अन्त में दिगम्बर जैन बीसपन्थी कोठी है जो उपरैली कोठी कहलाती है।
  • बीसपन्थी कोठी:-  तीनों कोठियों में बीसपन्थी कोठी सबसे प्राचीन है। कोठी के साथ स्थापित मन्दिर में पार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा विराजमान है।
  • तेरापन्थी कोठी:- यहाँ चन्द्रप्रभु जिनालय की उन्नत वेदी में चन्द्रप्रभु भगवान की पांच फुट अवगाहना की श्वेत वर्ण पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। चैक में 51 फुट ऊंचा श्वेत मान स्तम्भ बना हुआ है। चैक में दायी ओर मुख्य मन्दिर है, जिसमें तेरह वेदियाँ है, ये सभी शिखरबन्द स्वतन्त्र जिनालय है ये जिनालय निम्नानुसार हैः-
  • श्री शान्तिनाथ जिनालय – तीन दर की वेदी में सवा फुट पीतल की शान्तिनाथ भगवान की मूलनायक प्रतिमा के अतिरिक्त एक पाषाण की तथा 4 धातु की प्रतिमाएँ है। पीतल के एक-एक फुट ऊँचे दो मानस्तम्भ है, जिनमें प्रतिमाएँ विराजमान है।
  • श्री समवसरण मन्दिर – तीन उन्नत कटनियों पर गन्धकुटी है। उसमें भगवान पार्श्वनाथ की दस इंच अवगाहना वाली चार प्रतिमाएँ चारों दिशाओं में है।
  • श्री नेमिनाथ चैत्यालय – मूलनायक भगवान नेमिनाथ की 3 फुट अवगाहना की कृष्ण वर्ण पद्मासन पाषाण प्रतिमा के अतिरिक्त दो श्वेत पाषाण की खडगासन, दो पद्मासन तथा एक सिद्ध प्रतिमा है।
  • श्री पुष्पदंत जिनालय – भगवान पुष्पदंत की सं. 1878 में प्रतिष्ठित श्वेत वर्ण सवा तीन फुट अवगाहना की पद्मासन मूलनायक प्रतिमा है। इसके अतिरिक्त नौ पीतल की पद्मासन, एक खडगासन, एक सिद्ध भगवान की प्रतिमा और संगमरमर के फलक पर चौबीस चरण है।
  • श्री अजितनाथ जिनालय इसमें भगवान अजितनाथ की 2 फुट पद्मासन श्वेतवर्ण प्रतिमा मूलनायक है। इसके अतिरिक्त छह पद्मासन, एक खड्गासन, दो पद्मावती देवी के ऊपर पार्श्वनाथ की तथा दो सिद्ध भगवान की प्रतिमाएँ है।
  • श्री पार्श्वनाथ मन्दिरयहाँ लगातार तीन वेदियाँ है। बीच की वेदी में चिन्तामणि पार्श्वनाथ की कृष्णवर्ण पद्मासन लगभग 6 फुट अवगाहना वाली प्रतिमा है। बायीं ओर की वेदी में 14 और दायीं वेदिका में 11 मूर्तियाँ विराजमान है। बायीं वेदी में श्रेयांसनाथ की तथा दायीं वेदी में चन्द्रप्रभु की मुख्य प्रतिमाएँ है।
  • इस मन्दिर में अष्टकोण मण्डप में चार चबुतरों पर बावन जिनालय और बीच में पंचमेरू की रचना की गई है। चारों दिशाओं में 13-13 चैत्यालय है। पांच मेरू मन्दिरों में 80 प्रतिमाएँ है।
  • श्री शान्तिनाथ जिनालय3 फुट अवगाहना की भगवान शान्तिनाथ की श्वेत वर्ण पद्मासन प्रतिमा मूलनायक है। साथ ही पाषाण और धातु की 13 प्रतिमाएँ तथा पीतल के दो मानस्तम्भ है।
  • श्री नेमिनाथ जिनालय – भगवान नेमिनाथ की 3 फुट की कृष्ण वर्ण पद्मासन प्रतिमा के अतिरिक्त दो पाषाणों में चौबीसी, 6 पाषाण प्रतिमाएँ और एक पीतल की सिद्ध प्रतिमा है।
  • विशाल सरस्वती भवन है।
  • श्री चन्द्रप्रभु जिनालय – समवसरण है जिसमें भगवान चन्द्रप्रभु की एक फुट ऊँची प्रतिमा विराजमान है।
  • भगवान महावीर की साढे सात फुट की खड़गासन कृष्ण वर्ण प्रतिमा एक पाषाण पीठ पर विराजमान है। दिवाल के सहारे तीन दिशाओं में 24 तीर्थंकरो की खड्गासन समान अवगाहना की प्रतिमाएँ है। आगे पीतल की पद्मासन प्रतिमाएँ तथा श्वेत पाषाण की पद्मासन प्रतिमाएँ तथा वेदी पर पाषाण की 32 तथा धातु की 40 प्रतिमाएँ विराजमान है।
  • सहस्त्रकूट चैत्यालय – यह लगभग चार फुट ऊँचा संगमरमर का बना हुआ है। बीसपन्थी कोठी:- इसके मुख्य मन्दिर में आठ शिखर बन्द जिनालय है, जो इस प्रकार है:-
  • एक गर्भगृह में दो वेदियाँ है। पहली वेदी में भगवान पार्श्वनाथ की मुख्य प्रतिमा के अतिरिक्त 8 पाषाण प्रतिमाएँ है। दूसरी वेदी में भगवान अजितनाथ की मुख्य प्रतिमा के अतिरिक्त 6 धातु पाषाण प्रतिमाएँ है।
  • पार्श्वनाथ जिनालय – इसमें पार्श्वनाथ प्रतिमा के अलावा पीतल की एक चौबीसी है।
  • पुष्पदंत जिनालय – मूलनायक के अतिरिक्त दो खड्गासन, तीन पद्मासन प्रतिमाएँ और अष्ट मंगल द्रव्य है।
  • पार्श्वनाथ जिनालय में कृष्ण वर्ण की पार्श्वनाथ प्रतिमा के अतिरिक्त दो पाषाण की, पीतल की 48 प्रतिमाएँ तथा पीतल के दो नन्दीश्वर जिनालय है। 5...
  • इसमें पाँच पाषाण प्रतिमाएँ है, 1 मेरू और 1 चरण युगल है।
  • सरस्वती भवन है।
  • चांदी की वेदी में ऊपर की कटनी में पीतल की तीन, नीचे पीतल की 4 प्रतिमाएँ और 1 चौबीसी विराजमान है।
  • आदिनाथ की कृष्ण वर्ण प्रतिमा तथा दो श्वेत वर्ण पाषाण प्रतिमाएँ विराजमान है।
  • कोठी के सामने बाहुबली टेकरी पर विशाल मन्दिर में चौबीस मन्दरियाँ बनी है, जिनमें चौबीस तीर्थंकर विराजमान है। प्रांगण में बाहुबली स्वामी की श्वेत खड्गासन 25 फुट अवगाहना वाली प्रतिमा विराजमान है। बाहुबली जिनालय के दायें और बायें गौतम स्वामी और पार्श्वनाथ भगवान के जिनालय है तथा सामने 51 फुट ऊँचा मानस्तम्भ है।
  • सम्मेदशिखर की यात्रा के लिए ऊपर जाने के दो मार्ग है एक पर्वत के दक्षिण की ओर से नीमिया घाट होकर और दूसरा मधुबन की ओर से। नीमिया घाट से जाने पर पर्वत की वन्दना उलटी पडती है।
  • मधुबन की ओर से यात्रा 9 कि.मी. जाना एवं 9 कि.मी. आना इस प्रकार 18 कि.मी. की पडती है। धर्मशाला से चलकर 1 फर्लांग की दूरी से ही पर्वत की चढ़ाई प्रारम्भ हो जाती है। यहाँ से करीब 3 कि.मी. पर गन्धर्व नाला पड़ता है, यहाँ बीस पन्थी कोठी की ओर से धर्मशाला बनी हुई है।
  • 6 कि.मी. की यात्रा पर सीता नाला पड़ता है। पहाड़ पर ऊपर चढने पर सर्वप्रथम गौतम स्वामी की टोंक पड़ती है। टोंक मे बायें हाथ की ओर मुडकर पूर्व दिशा में पन्द्रह टोंकेें है। ये टोंकें ही कूट कहलाती है। इन टोंको में भगवान चन्द्रप्रभु की टोंक सबसे ऊँची है। इन टोकों में तीर्थंकरों  के  चरण  विराजमान है।  सभी  टोकों  के  दर्शन करते हुए
  • अभिनन्दननाथ टोंक से उतरकर जल मन्दिर में जाते है यहां बने विशाल मन्दिर के चारों और जल भरा है। इसमें भगवान पार्श्वनाथ की साढे 3 फुट अवगाहना वाली कृष्ण पाषाण की पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। इसके अगल-बगल में ढाई फुट पाषाण की चार प्रतिमाऐं है।
  • यहां से गौतम स्वामी की टोंक पर पहँुचते है। यहाँ पश्चिम की ओर नौ टोंकोे (1) धर्मनाथ टोंक (2) सुमतिनाथ टोंक (3) शान्तिनाथ टोंक (4) महावीर टोंक (5) सुपार्श्वनाथ टोंक (6) विमलनाथ टोंक (7) अजितनाथ टोंक (8) नेमिनाथ टोंक एवं (9) पार्श्वनाथ टोंक के दर्शनवन्दन कर सम्मेदशिखर तीर्थयात्रा पूर्ण होती है।

उपलब्ध सुविधाएं

सिद्धक्षेत्र शाश्वत तीर्थराज श्रीसम्मेदशिखरजी

क्षेत्र पर उपलब्ध सुविधाएँ

आवास – कमरे – 580, हाल – 30, गेस्ट हाऊस – 15, यात्री ठहराने कुल क्षमता – 4500, भोजनशाला – उपलब्ध है, औषधालय – उपलब्ध है, पुस्तकालय – उपलब्ध है, विद्यालय – उपलब्ध है, ।

आवागमन के साधन

रेल्वे स्टेशन – पार्श्वनाथ – 23 कि.मी., गिरिडीह – 32 कि.मी.।

बस स्टैण्ड – गिरिडीह।

पहुँचने का सरलतम मार्ग – गिरिडीह से मेन लाईन पर मधुबन से,  गया- कलकत्ता मार्ग पर पारसनाथ रेल्वे स्टेशन से मधुबन से।

समीपस्थ तीर्थ क्षेत्र

पावापुरी – 225 कि.मी., गुणावाँ – 200 कि.मी., कुण्डलपुर – 250 कि.मी., राजगिर – 235 कि.मी.।

प्रबन्ध व्यवस्था

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र सम्मेद शिखर कमेटी बीसपंथी कोठी

अध्यक्ष – श्री अजयकुमार जैन, देवाश्रम, आरा (0933-4396920)

मंत्री – श्री हीरालाल चन्दूलाल शाह, मुम्बई (022-23878293)

मेलामंत्री – श्री महावीर प्रसाद सेठी (06557-235889)

प्रबन्धक – श्री मनोहरलाल जैन, मधुबन (06558-232209)

तीर्थक्षेत्र की वेबसाइट
भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी
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धर्मशाला आरक्षित करें
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निकटतम प्रमुख नगर:
गिरिडीह - 32 कि.मी., ईसरी - 23 कि.मी.।
प्रमुख विशेषताएँ
तीर्थराज सम्मेदशिखर की गरिमानुरूप यहां सर्वाधिक तीर्थयात्री आते है। अतः यहां यात्रियों की सुविधा हेतु जिनलायों, धर्मशालाओं आदि की व्यवस्था हेतु अनेक संस्थाऐं/कमेटियाँ सेवारत है जिनमें से प्रमुख है:-
1. दिगम्बर जैन तेरापंथी कोठी (06558-232291)
2. मध्यलोक शोध संस्थान (06558-232257)
3. उत्तरप्रदेश प्रकाश भवन (06558-232366, 232367)
4. शाश्वत ट्रस्ट भवन (06558-232314, 232378)
5. श्री दिगम्बरजैन म्यूजियम शोध समिति (06558-232253 0731-3657024)
6. आचार्य सुमतिसागर त्यागीव्रती आश्रम (06558-232261)
7. दिगम्बर जैन मन्दिर, चोपड़ा कुण्ड (06558-232347, 232245)
8. दि. जैन यात्री निवास तीर्थक्षेत्र कमेटी (06558-232265)
9. दि. जैन तरण तारण कोठी
10. दि. जैन लमेचू भवन
11. बीसपंथी कोठी, ईसरी बाजार (06558-233254)
12. तेरापंथी कोठी, ईसरी बाजार (06558-233228)

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी

भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी का इतिहास

देश भर में दूरदूर तक स्थित अपने दिगम्बर जैन तीर्थयों की सेवा-सम्हाल करके उन्हें एक संयोजित व्यवस्था के अंतर्गत लाने के लिए किसी संगठन की आवश्यकता है , यह विचार उन्नीसवीं शताब्दी समाप्त होने के पूर्वसन् 1899 ई. में, मुंबई निवासी दानवीर, जैन कुलभूषण, तीर्थ भक्त, सेठ माणिकचंद हिराचंद जवेरी के मन में सबसे पहले उदित हुआ ।


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