हमारी उपलब्धियाँ

देश भर में स्थित विभिन्न दिगम्बर जैन तीर्थों की देखरेकरके उन्हें एक संयोजित व्यवस्था के अंतर्गत लाने के लिए किसी संगठन की आवश्यकता है, यह विचार उन्नीसवीं शताब्दी समाप्त होने के पूर्वसन् 1899 ई.में मुंबई निवासी दानवीर, जैनकुलभूषण, तीर्थ भक्तसेठ माणिकचंद हिराचंदजवेरी के मन में सबसे पहले उदित हुआ ।
सेठ साहब मुंबई प्रांतीय दिगम्बर जैनसभा के सर्वेसर्वा थे। अपने संकल्प को साकार करने के लिए उन्होंने उसी सभा में तीर्थ रक्षा विभाग की स्थापना की तथा समीपस्थ शत्रुंजय,तारंगा और पावागढ़ आदि क्षेत्रों पर जीणोद्धार एवं व्यवस्था संबंधी कार्य प्रारम्भ कराये ।यह व्यवस्था सेठ माणिकचंदजी के विराट संकल्पों की पूर्ति नहीं कर पाई । इतने बड़े देश में फैले हुए अनगिनत दिगम्बर जैन तीर्थों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र संस्था की आवश्यकता उनके दूरदर्शी मन में प्रखरता से उभरती रही ।
भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के अधिवेशनों के अवसर पर जवेरी जी ने अपने पूज्य तीथों के विधिवत संरक्षण और संचालन की आवश्यकता समाज के सामने प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत की। उनके विचारों को समाज की सहमति प्राप्त हुई और इस लक्ष्य कीपूर्ति के प्रति समाज में एक उत्साह भरा वातावरण बनने लगा ।

यों तो सन् १९९७ में रांची उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले से मूर्तिपूजक श्वेताम्बर जैन समाज को गहरा आघात लगा था, परन्तु इस बार दिनांक २५/९/२००४ को रांची उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले से सेठ आनंदजी कल्याणजी के स्वामित्व के सभी अधिकार ध्वस्त हो गये। न्यायालय ने शिखरजी तीर्थ के प्रबंधन के लिए झारखण्ड राज्य सरकार को दिगम्बर-श्वेताम्बर मंदिरों की तथा ४६ एकड़ भूमि की व्यवस्था हेतु एक प्रबंधन कमेटी की रचना करने तथा उसमें दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करने के लिए कहा है। इस प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष के रूप में जिलाधिकारी उपायुक्त होंगे तथा राज्य सरकार व्यवस्था देखने के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति कर सकती है तथा आवश्यकता पड़ने पर कानून भी बनाने का सुझाव झारखण्ड राज्य को दिया गया है। इस कष्टसाध्य सफलता प्राप्त करने में भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की विपुल धनराशि व्यय हुई है। केस में सफलता प्राप्त होने में हमारे तत्कालीन अध्यक्ष साहू अशोक कुमार जैन का सहयोग रहा, इसके साथ-साथ सभी आचार्यों, मुनिराजों, आर्यिका माताओं के आशीर्वाद व समस्त दिगम्बर जैन समाज का सहयोग रहा है।

इस प्रकार तीर्थक्षेत्र कमेटी के माध्यम से एवं दिगम्बर जैन समाज के सहयोग से तीर्थक्षेत्रों में जो भी कार्य हुए हैं उनके लिए तीर्थक्षेत्र कमेटी सभी के प्रति आभारी है। तीर्थक्षेत्र कमेटी ने तीर्थों का संरक्षण करने एवं उनका जीर्णोद्धार कर-कराकर उन्हें यथावत रूप में भावी पीढ़ी को सौंपने तथा तीर्थ भक्तों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरसक प्रयत्न दशकों से कर रही है। आप सभी को जानकार गर्व होगा कि पिछले २०-२५ वर्षों में जिस तेजी के साथ तीर्थक्षेत्र कमेटी ने अपने उत्तरदायित्वों को निर्वाह है उससे संपूर्ण भारतवर्ष का दिगंबर जैन समाज परिचित है। यह आप सभी के असीम सहयोग एवं वात्सल्य भावना का ही सुपरिणाम हैं।

तीर्थक्षेत्र कमेटी के प्रमुख पड़ाव

१) भारत के समस्त दिगम्बर जैन तीर्थों का प्रामाणिक परिचय कराता हुआ दिगम्बर जैन तीर्थ ग्रन्थ भाग १ ते ५ तक का प्रकाशन।

२) ६५ तीर्थक्षेत्रों का सर्वेक्षण कराकर उनके महत्वपूर्ण रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा गया। शेष क्षेत्रों का सर्वेक्षण कार्य प्रगति पर है।

३) शिखरजी पहाड़ पर स्थित डाक बंगले में तीर्थयात्रियों के आवास एवं नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था।

४) शिखरजी पहाड़ की वंदना हेतु जाने-आने के मार्ग का पक्कीकरण, छतरियों, बेंचों एवं पुलों का निर्माण, गंधर्व नाले के पास भाताघर का पुनरोद्धार कर नवीनीकरण किया गया है।

५) शिखरजी (मधुबन) में शाखा कार्यालय भवन का निर्माण।

६) शिखरजी पर तीर्थयात्रियों की सुरक्षा हेतु रक्षकों एवं नित्य-नियमित टोकों के पूजा-प्रक्षाल हेतु पुजारियों की नियुक्ति की गई है।

७) पहाड़ पर प्राथमिक चिकित्सा एवं पेयजल की व्यवस्था रखी गई है।

८) पहाड़ पर पूजन सामग्री, शास्त्र भण्डार एवं छत्र आदि की सुविधा है।

९) तीर्थ सुरक्षार्थ टोकों पर तीर्थक्षेत्र कमेटी की दान पेटी रखी गई है।

१०) पारसनाथ पहाड़ पर नित्य आरती एवं स्थायी पूजन व्यवस्था तथा त्यौहारों पर श्रीजी की मूर्ति विराजमान कर अभिषेक का आयोजन।

११) पारसनाथ टोंक पर अखण्ड पाठ एवं शांति विधान का समय-समय पर आयोजन।

१२) मधुबन में यात्री निवास की व्यवस्था एवं नाममात्र शुल्क पर भोजनालय।

१३) सन्मति साधना स्कूल-सड़क का निर्माण एवं मधुबन ग्राम के आसपास के ग्रामवासियों के शैक्षणिक एवं चिकित्सार्थ जनकल्याणकारी भोजनाएं।

समिति साधन और दायित्व:-

तीर्थक्षेत्र का संरक्षण, संवर्धन, सुचारु संचालन, सुव्यवस्था एवं जैन पुरातत्व के अवशेषों के संरक्षण का प्रमुख दायित्व संभालते हुए आपकी इस संस्था ने अपने कार्यकाल के ११७ वर्ष पूरे कर लिये हैं। स्थापना काल से तीर्थक्षेत्र कमेटी की अधिकांश शक्ति तीर्थक्षेत्रों के संरक्षण विशेषकर तीर्थराज श्री सम्मेदशिखरजी के संरक्षण- संवर्धन और उसके समुन्नत विकास में लगी है। यह प्रसन्नता की बात है कि काफी समय से लंबित शिखरजी तीर्थ के विवाद में दिगम्बर जैन समाज को सफलता मिली है और शिखर की प्रबंध व्यवस्था में उसे बराबर का हक न्यायालय ने दिया है। न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए तीर्थक्षेत्र कमेटी ने वहां विकास के जो नये कार्यक्रम बनाये हैं और जिनके बारे में हमने उपरोक्त पंक्तियों में आप सभी का ध्यान आकृष्ट किया है।

परमपूज्य स्व. आचार्य समंतभद्रजी महाराज एवं स्व. मुनि श्री १०८ आर्यनंदीजी महाराज की प्रेरणा व आशीर्वाद तथा वर्तमान में परम पूज्य अमरकीर्तिजी महाराज व मुनि श्री अमोघकीर्तिजी महाराज तथा  दिगम्बर जैन समाज के सहयोग से तीर्थक्षेत्र कमेटी में करीब १० करोड़ रुपये का ध्रुवफण्ड एकत्रित हुआ है. जिसके ब्याज की आमदनी से उपरोक्त कार्यक्रमों का संचालन हो रहा है। आप सभी ने यह अनुभव किया होगा कि सरकार की बदलती नीतियों के कारण हमें इनवेस्टमेंट पर जो ब्याज मिलता था उसमें काफी कमी आयी है। ऐसी परिस्थिति में समाज का सहयोग आवश्यक है। वर्तमान में जो कार्यक्रम चल रहे हैं उन्हें गति प्रदान करने एवं तीर्थक्षेत्रों के संरक्षण, संवर्धन और उनके समुन्नत विकास में विपुल धनराशि की आवश्यकता है।

तीर्थक्षेत्रों/पुरातत्व महत्व के प्राचीन जिनमंदिरों का जीर्णोद्धार:-

तीर्थक्षेत्र कमेटी जहां एक ओर लाखों रुपयों की धनराशि तीर्थक्षेत्रों के हकों एवं अधिकारों को सुरक्षित रखने पर व्यय कर रही है वहीं दूसरी ओर जीर्णशीर्ण हो रहे तीर्थक्षेत्रों के पुरातत्व महत्व के प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार एवं यात्री सुविधा में सहयोग दे रही है। जैसे-जैसे कमेटी की स्थिति सुदृढ़ होती गई वैसे-वैसे सहायता की राशि में अभिवृद्धि कर स्थानीय प्रबंध समितियों को सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

अंचलीय समितियों का गठन:

देश के कोने-कोने में फैले २०० से अधिक तीर्थक्षेत्रों की सुरक्षा, उनका सुचारू-संचालन व जीर्णोद्धार आदि कायाX का कमेटी स्वयं जाकर निरीक्षण करे यह संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक समझा गया कि प्रत्येक प्रांत की अलग समितियों का गठन कर उनकी अनुशंसानुसार तीर्थक्षेत्रों के जीर्णोद्धार एवं यात्री सुविधा तथा सम्यक विकास में सहयोग दिया जाय। इस उद्देश्य से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पूर्वांचल, राजस्थान, कर्नाटक एवं तमिलनाडू, केरल, आन्ध्रप्रदेश एवं पांडिचेरी अंचलिय समितियों का गठन किया गया है और उनकी अनुशंसानुसार यह कमेटी आर्थिक एवं अन्य प्रकार से सहयोग प्रदान कर रही है। उत्तर प्रदेश अंचल के लिए स्वतंत्र कमेटी गठित करने का प्रयास चल रहा है।

तीर्थक्षेत्र प्रबंधन प्रशिक्षण प्रशिक्षण संस्थान, द्रोणगिरि:-

कई तीर्थक्षेत्रों पर कुशल एवं प्रशिक्षिक कार्यकर्ता (मैनेजर, मुनीम) उपलब्ध नहीं हो सकने से तीर्थक्षेत्रों के विकास की गति अवरुद्ध थी। इस पर विचार करते हुए तीर्थक्षेत्र कमेटी ने यह आवश्यक समझा कि इसके लिए तीर्थक्षेत्र कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाकर उसके माध्यम से समाज के नवयुवकों को प्रेरणा देकर उन्हें इस कार्य के लिए प्रशिक्षित किया जाये, जिससे हमारे तीर्थक्षेत्रों की सुरक्षा- व्यवस्था में उत्तरोत्तर विकास हो सके। इसके लिए श्री द्रोणगिरि क्षेत्र पर तीर्थक्षेत्र प्रबंधन प्रशिक्षण प्रशिक्षण संस्था की स्थापना की गई है, जिसमें नवयुवकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, संस्थान के इस वर्ष 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। समाज को यह जानकर हर्ष होगा कि यहां के कई प्रशिक्षित कार्यकर्ता विभिन्न तीर्थक्षेत्रों, मंदिरों एवं संस्थाओंमें नियुक्त किये गये हैं और उनकी प्रशंसा प्राप्त हो रही है।

शाश्वत तीर्थ श्री सम्मेदशिखर जी की प्राचीन पवित्र टोकों का जीर्णोद्धार

जैन समाज के लिए यह गौरव की बात है कि दशाब्दियों के बाद उसे सम्मेदशिखर पहाड़ स्थित सभी टोकों एवं मंदिरों के जीर्णोद्धार का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। जैन समाज के परस्पर सहयोग से पवित्र तीर्थ की सभी टोकों के आसपास का परिसर, रेलिंग एवं सीढियां आदि बनाकर उन्हें वंदना करने के लिए काफी सुगम बनाया गया है। कई टोकों के गुंबद जो तेज हवा एवं अन्य प्राकृतिक प्रकोपों से क्षतिग्रस्त हो गये थे उनका जीर्णोद्धार कर व्यवस्थित किया गया है। जीर्णोद्धार के इस कार्य को सुव्यस्थित और सुंदर ढंग से करने के लिए मकराना (जयपुर) से कुशल कारीगरों द्वारा सुंदर कारीगारी कराकर कार्य संपन्न किया गया है। जिन टोकों के ध्वजटण्ड टूट गये थे उन्हें ठीक कराया गया हैं। स्तंभ जो टूटे हुए थे उन्हें भी दुरुस्त कराया गया है। इस प्रकार सभी टोकों पर रंग रोगन कराकर उन्हें सुंदर बनाया गया है, ताकि हर यात्री सुविधापूर्वक टोकों की वंदना कर अपना आत्मकल्याण कर सके।

४५ हजार फीट ऊंचे पहाड़ की टोकों का जीर्णोद्धार कराना काफी श्रमसाध्य एवं खर्चीला कार्य है, जिसे जैन समाज के परस्पर सहयोग से ही पूरा किया जा सका है। इसी आलोक में आप सभी को यह जानकर अत्यधिक हर्ष होगा कि जैन समाज के परस्पर सहयोग से ही पारसनाथ एवं गौतम स्वामी टोंक पर ४-४ नये पूजा कक्ष बनाये गये हैं जिनका लाभ हमें मिल रहा है।

भावी योजनाएँ

१) प्राचीन तीर्थक्षेत्र के संरक्षण संवर्धन और उनके समुन्नत विकास में सहयोग देना।

२) शेष तीर्थक्षेत्रों का सर्वेक्षण कराकर उनके राजस्व व भूमि संबंधी रिकॉर्ड को सुव्यवस्थित करना।

३) सम्मेदशिखर, श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ क्षेत्र सिरपुर, श्री ऋषभदेव (केसरियाजी), श्री गिरनारजी आदि तीर्थक्षेत्रों पर चल रहे मुकदमों का संचालन करना।

४) सम्मेदशिकर पहाड़ पर नई धर्मशाला बनाना।

५) मधुबन में सुविधायुक्त विशाल धर्मशाला का निर्माण करना।

६) भाताघर का अधूरा कार्य पूर्ण करना एवं पेयजल की व्यवस्था करना।

७) तीर्थ वंदना प्रतीक का निर्माण।

८) तीर्थक्षेत्र कार्यकर्ता प्रशिक्षण योजना का संचालन।

९) तीर्थक्षेत्र कमेटी की पुरानी वेबसाइट को संशोधित कर नई वेबसाईट बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। यह कार्य वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रभातचंद्र जैन के मार्गदर्शन में चल रहा है।