History of Bharatvarshiya Digambar Jain Teerthkshetra Committee

There was a need for an organization to look after the various Digambar Jain Tirthas located all over the country and bring them under a cohesive system, the idea came first in the mind of Danveer, Jainkulbhushan, Tirtha devotee Seth Manikchand Hirachandajveri, Mumbai in the year 1899 before the end of the nineteenth century.

Seth Saheb was the surveyor of the Mumbai Pranteeya Digambar Jain Sabha. In order to realize his resolve, he established the Teerth Raksha Department in the same assembly and started the work of renovation and arrangement on the adjacent Teerthas like Shatrunjaya, Taranga and Pavagadh etc. This system could not fulfil dream of Seth Manikchandji. The need for an independent institution to protect the countless Digambar Jain pilgrimages spread over such a large country continued to emerge in his visionary mind.

On the occasion of the conference of the Bharatvarshiya Digambar Jain Mahasabha, Zaveri ji presented vision for the duly preservation and operation of venerated Tirthas as a priority to the society. His ideas got the consent of the society and towards the fulfilment of this goal, an enthusiastic atmosphere started forming in the society.

on 22nd Oct 1902

Establishment of the Committee

In 1900, after freeing himself from business engagements, Seth Saheb started working hard to organize and make good arrangements for the pilgrimage areas as per his interest. On many occasions, he introduced the society to the problems of pilgrimages at many places and prepared an atmosphere for the establishment of an All India Organization for their solution. Within two years, Seth Sahib got a favourable opportunity for the success of his long endeavour.

In Vikram Samvat 1959, from Kartik Vadi Panchami to Dashveen i.e. from 22-10-1902 to 26-10-1902, the seventh annual conference of the Bharatvarshiya Digambar Jain Mahasabha was held in Mathura. Seth Manikchandji from Mumbai, along with Seth Ramachandranatha ji, Seth Gurmukh Rai, Pandit Dhannalalji and Pandit Jawahar Lal ji Shastri, along with many colleagues attended this conference. Pandit Gopaldas ji Baraiya was also present at the conference.

Seth Manikchandji gave a very poignant speech on the need of social organization while describing the pathetic condition of the pilgrimage areas.

At the same time, the ‘Bharatvarshiya Digambar Jain Teerthkshetra Committee’ was formed on 22 October 1902 with the support of Pandit Gopaldasji Baraiya’s proposal, seth Manikchandji’sveri (Mumbai), Shri Babu Devkumarji Rais Aara and Munshi Champatrayji. With the proposal of 51 members, Seth Manikchandji was nominated. Seth Manikchandji was nominated as founding general secretary of the committee.

Seth Chunnilal Jhaverchand and Lala Raghunathdas Sarno were appointed as Assistant General Secretaries. Prior to this, ever since the Bombay Pranteeya Digambar Jain Sabha started the Department of Teerth Raksha under it, Shri Chunnilal Javerchand was taking interest in the work of the pilgrimage areas. The annual sessions of the Mahasabha were held in Mathura for almost ten years.

In 1904, the 10th annual conference of the Mahasabha was held at Ambala Cantt in the month of December, with the earnest efforts of Assistant General Secretary Lala Banarsi Dasji. The first meeting was chaired by Lala Salekchand ji Rais, Najibabad.

The second day on 29 December 1904, Seth Dwarkadasji arrived at Ambala from Mathura to attend the conference. His procession was taken out in a big way. He was elected President of the Mahasabha that year. By this time, three years of the establishment of the Teerkshetra Committee were completed. The society observed its functions and found them satisfactory and commended the committee.

उसी अधिवेशन में भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के संबंध में महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया ।
वह प्रस्ताव इस प्रकार है :’प्रस्ताव नं.10, अष्टम वर्ष की दुरुस्ती में महासभा तसदीक करती है कि कमेटी जो तीर्थक्षेत्रों की निगरानी के वास्ते महासभा के सातवें वर्ष में नियत हुई थी,वह बदस्तूर कायम रहे और उसके कार्यकर्ता भी वे ही रहें तथा महासभा अधिकारदेती है कि कमेटी अपनी नियमावली अपने ही मेम्बरों से मंजूर कराकर कार्यवाही करे।

तब जाकर तीर्थक्षेत्र कमेटी की स्वतंत्रनियमावली का निर्माण हुआ और उसे स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त हुआ । सेठ जी गहरी रुचि लेकर तीर्थों की व्यवस्था देखनेलगे, जहाँ भी किसी क्षेत्र पर कोई विपत्ति आतीया कोई समस्या खड़ी होती, अविलम्ब वहाँ पहुँचकर सेठ माणिकचन्दजी उसका समाधान करते थे। शिखरजी में उपरैलीबीसपंथी कोठी का चार्ज कमेटी को मिलने में कुछ बाधाएं आ रही थी । सेठसाहब स्वयं वहाँ गये और उन्होंने चार्ज प्राप्त कराया ।

एक बार जब शिखरजी केपर्वत पर अंग्रेजों के रिहायसी बंगले बनवाने की योजना बनी, सेठ साहब ने उसके विरोध के लिए शिखरजी का दौरा किया और कमिश्नर से लेकर वायसराय तकसमाज का विरोध प्रदर्शित करके वह योजना समाप्त कराने में सफल हुए ।सेठ माणिकचंद हीराचंद जी जवेरी इस कमेटी केस्वप्नदृष्टा संस्थापक अध्यक्ष तो थे ही, वे ही इस संस्था के प्राण भी थे ।

स्थापनाकाल में समाज ने या महासभा ने इस कमेटी को कोई फण्ड उपलब्ध नहीं कराया था। दानवीर जवेरी जी ने अपनी उदारता और प्रबंध पटुता से उस अंकुर को ऐसा सींचा, उसकीसुरक्षा का ऐसा पुख्ता प्रबंध कियाकि वह छोटी सी संस्था आज एक विशाल छायादार वृक्ष की तरह, देशभर के सभी जाने-अनजाने तीर्थों को अपना संरक्षण देनेकी क्षमता लेकर खड़ी है ।जवेरी जी ने चार वर्ष तक एक मुनीम रखकर कमेटी का सारा पत्राचारऔर हिसाब-किताब अपनी पेढ़ी पर ही रखा । प्रारम्भ में लाल रंग का एक छोटा साबस्ता ही इस कमेटी का कार्य साधन था । चार ही वर्ष में जवेरी जी के परिश्रम सेकमेटी का कार्य इतना बढ़ गया कि एक पृथक कार्यालय उसके लिए आवश्यक लगने लगा ।

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1 अगस्त, 1906 को

हीराबाग में कार्यालय की स्थापना

एक दिन सेठ माणिकचन्दजी ने बाबू शीतलप्रसाद जी से कहा कि महासभा के अधिवेशन में भारवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की स्थापना स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए की गई थी । कमेटी का कारबार अभी तक महामंत्री के नाते हमअपनी दुकान से संचालित कर रहे हैं । शिखरजी का बीसपंथी कोठी का मुकदमा कमेटी को लड़ना पड़ा है जिससे उस पर लगभग आठ हजार रुपए का कर्जा हो गया है । अभी कमेटी का काम बम्बई प्रांतिक दिगम्बर जैन सभा के द्वारा ही चलाया जारहा है इसलिए यह कर्जा भी उसी सभा पर है । इसी कर्ज की स्थिति के कारण सभाके महामंत्री पंडित गोपालदासजीबरैया सभा का हिसाब पास कराने में संकोच कररहे हैं । ऐसी स्थिति में यदि आप थोड़ा समय दें और कमेटी के कार्यालय कीदेखरेख की जिम्मेदारी ले सकें, तो भारतवर्षीयदिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी का कार्यालय हीराबाग में स्थापित कर दिया जाये । तब आवश्यकतानुसार प्रबंधक आदिकी नियुक्तिकरके तीर्थों का काम सुचारु ढंग से कराया जाये । कर्ज का उचित जमाखर्च हो जाये, ताकि बम्बई प्रांतिक सभा का हिसाब पास कराया जा सके । हमारी दुकान पर तीर्थों के जो खाते हैं, वे भी कमेटी के कार्यालय में स्थानांतरित कर दिये जाएँ। बाबू शीतलप्रसाद जी ने इस सुझाव की सराहना की और स्वयं भी कमेटी के कार्यालय में प्रतिदिन समय देना स्वीकार किया । इस प्रकार 1 अगस्त,1906 के दिन तीर्थक्षेत्र कमेटी का कार्यालय हीराबाग के हॉल में स्थापित हुआ, जहाँ वह अबतक चल रहा है।

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    बाबू शीतलप्रसाद जी महामंत्री के सहायक के नाते उस कार्यालयके प्रथम प्रभारी बने, तथा बाबू बुधमल जी पाटनी जो हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत के जानकार थे, कमेटी में प्रबंधक नियुक्त किये गये । जैन गजट, जैन बोधक,जैन मित्र और जिन विजय में इस कार्यालय की स्थापना की सूचना प्रकाशित की गई,उस पुण्य पुरुष की पवित्र भावनाओं की छत्र-छाया में एक सौ तेरह वर्षों से आजतक संस्था का मुख्य कार्यालय उसी स्थान पर चल रहा है ।

    तीर्थ-रक्षा का यह कार्यऔर यह कार्यालय, निरन्तर चलता रहे, इस भावना से उन्होंने कमेटी के व्यय के लिए अपने ट्रस्ट की आय में से कुछ नियमित राशि इस कमेटी को प्रदान करने का प्रावधान कर दिया था, जो आज तक अनवरत रूप से प्राप्त हो रहा है ।तीर्थक्षेत्र कमेटी के संस्थापक सेठ माणिकचन्द जी जितने उत्कृष्ट तीर्थ-भक्तथे, उतने ही दूरदर्शी भी थे । बाबू शीतलप्रसाद जी, जो बाद में ब्रह्मचारी शीतल प्रसाद बने, सेठ साहब के मित्र और परामर्श दाता थे ।

    उन्हीं के सत्परामर्श से सेठ साहबजैन-शिक्षण संस्थाओं के पोषण और जैन छात्रावासों की स्थापना की और भी अपनी शक्ति नियोजित कर रहे थे । सेठ साहब अब वृद्धावस्था का अनुभव करने लगे थे । अपनी आयु का अन्त उन्हें निकट दिखाई देने लगा था । इसी कारण इस नव-गठित तीर्थक्षेत्र कमेटी की बागडोर वे अपने सामने ही किन्हीं कुशल और सक्षम हाथों में सौंपकर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते थे ।इसी बीच सन् 1905 से 1907 तक सेठ माणिकचंद जी दिगम्बर जैनमहासभा के सभापति पद को सुशोभित कर चुके थे। तभी कुछ समय इन्दौर के उदीयमान महापुरुष सेठ हुकमचन्द जी उनके साथ महासभा के महामंत्री पद पर रहे।

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    सेठ माणिकचंद जी को इस संपर्क के आधार पर सेठ हुकमचन्द जी की प्रतिभा और क्षमता का परिचय मिला। इस नवोदित व्यक्तित्व में समाज को सक्षम नेतृत्व प्रदान करने की संभावना का अनुमान करने में सेठ माणिकचन्द जी को अधिक समय नहीं लगा । सेठ हुकमचन्द जी की धार्मिक आस्था और देव, शास्त्र, गुरु के प्रति उनकीश्रद्धा भक्ति से सेठ माणिकचन्द जी बहुत प्रभावित थे । इन्हीं संभावनाओं से आकर्षित होकर उन्होंने तीर्थक्षेत्र कमेटी की बागडोर सेठ हुकमचन्द जी के हाथों में सौंपने का अपने अत:करण में निर्णय कर लिया। थोड़े ही दिनों में उसके लिए उपयुक्त अवसर भी उन्होंने प्राप्त कर लिया सन् 1910 में श्रवण बेलगोला में गोम्मटस्वामीभगवान बाहुबलीका महा-मस्तकाभिषेक उन्होंने तीर्थक्षेत्र कमेटी की ओर से आयोजितकराया । उसी अवसर पर कमेटी का अधिवेशन बुलाकर उसमें स्वेच्छा से जवेरीजी ने स्थानापन्न अध्यक्ष के रूप में,रावराजा सर सेठहुकमचन्द जी को अत्यन्त प्रेरणा पूर्वक उस पद पर आसीन करा दिया। अब उनके पास तीर्थक्षेत्र कमेटी के महामंत्री का पद शेष रहा, जिसका उन्होंने आजीवन निष्ठापूर्वक निर्वाह किया ।

    चार वर्ष उपरान्त सन् 1914 में संस्था के संस्थापक सेठ माणिकचन्द जी जवेरी का निधन हो गया। सन् 1913 में, तीर्थक्षेत्र कमेटी के कानपुर अधिवेशन में सेठ हुकमचन्दजी स्थायी रूप से अध्यक्ष चुन लिये गये । लगातार लगभग आधी शताब्दी तक (26-2-1959 को मृत्यु पर्यन्त) कमेटी को सेठ साहब का मार्गदर्शन और सम्बल प्राप्त होता रहा। स्वर्गीय सेठ माणिकचन्द जी की आशा के अनुरूप ही उन्होंने कमेटी का संचालन किया । उनकी अध्यक्षता में उत्कर्ष करती हुई कमेटी के मंत्रित्व का भारसंस्था के आदि मंत्री सेठ माणिकचंद जी के निधन के उपरान्त 1914 में बम्बई के लाला भागमल प्रभुदयाल जी पर आया ।

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    सन् 1930 में कमेटी का पंजीयन

    लालाजी के निधन के पश्चात्1920 में,बम्बई अधिवेशन में श्री रतनचंदचुन्नीलालजवेरी को मंत्री चुना गया । श्री जवेरी बहुत सूझ-बूझ वाले, बड़े सतर्क और सेवाभावी मंत्री सिद्ध हुए । पद ग्रहण करते ही सन् 1920 में ही उन्होंने कमेटी के लिए बीस लाख रुपयों के स्थायी ‘तीर्थ-रक्षाफण्ड’ एकत्र करने का संकल्प किया। सारे देश में प्रत्येक दिगम्बर जैन घर सेएक रुपया वार्षिक नियमित योगदान की परम्परा भी उन्होंने प्रारम्भ की । चवालीस वर्षों तक लगन और परिश्रम के साथ उन्होंने कमेटी को अपनी सेवाएं अर्पित कीं ।सन् 1930 में उन्होंने कमेटी का पंजीयन कराया।

    शिखरजी के प्रकरण की लन्दन में प्रिवी काउंसिल तक पैरवी और सन् 1925 में श्रवणबेलगोला में, कमेटी की ओर से गोम्मटस्वामी के महा-मस्तकाभिषेक का आयोजन,जवेरीजी के मंत्रित्वकाल की उल्लेखनीय घटनाएं रहीं । तीर्थक्षेत्र कमेटी अपने उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में, उपलब्ध संसाधनों के अनुसार चलती रही, और पूरा समाज कमेटी के महान उत्तरदायित्वों के प्रतिसजग और जागरुक रहा । कमेटी को समाज का मुक्त हस्त सहयोग तो मिलता हीथा और प्रायः जहाँ भी समाज में सभा-सम्मेलन आदि होते थे वहाँ तीर्थक्षेत्र कमेटी के कार्यों की समीक्षा और सराहना की जाती थी । उदाहरण के तौर पर हम कमेटीकी समीक्षा का एक अंश यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जो आज से साठ वर्षपूर्व, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा का इतिहास लिखते समय, रेखांकित हुआ और महासभा के मुखपत्र’जैन गजट’ में प्रकाशित किया गया। ”कमेटी का कार्यबहुत ही व्यापक एवं समाजोपयोगी है ।

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    गत वर्षों में इसकाकार्य सेठ भागमलप्रभुदयाल जी द्वारा सुयोग्य रीति से चलता रहा। वर्तमान मेंइसका कार्य श्रीयुत सेठ चुन्नीलालहेमचन्द जी बम्बईवालों के महामंत्रित्व में अत्यंतसुयोग्य रीति से चल रहा है । सम्मेदशिखर जी का केस,जो कि कई वर्षों से चालूथा, जिसमें समाज के लाखों रुपयों का व्यय हो चुका है,उसमें सफलताअपनेसत्वों की रक्षा करना, यह कमेटी के परिश्रम का ही फल है । वर्तमान में श्वेताम्बरसमाज द्वारा तीर्थक्षेत्रों पर जगह-जगह अनेक प्रकार के नित नये उपद्रव पैदा किये जाते हैं। उनका समुचित प्रतिकार करने में कमेटी सदैव कटिबद्ध रहती है । पहलेसमय में तीर्थक्षेत्रों पर यात्रियों को बहुत ही कष्ट पहुँचता था। इस कमेटी ने अपने सुयोग्य प्रबंध से एक नहीं अनेक महत्व के कार्य किये हैं और किये जा रहे हैं । स्वर्गीय श्रीमान दानवीर सेठ माणिकचंदजी कमेटी के कर्णधारो में से एक थे । समाजमें जितना अस्तित्व आवश्यक है उतना ही इस कमेटी का अस्तित्व आवश्यक है इसलिए समाज का कर्तव्य है कि इसकी सहायता अवश्य सदैव करती रहे। जो अतीव सरल उपाय एक रुपया प्रति घर से लेना कमेटी ने स्थिर किया है, उसके देने में तो किसी गृहस्थ को संकोच नहीं होना चाहिए ।

    – ‘जैन गजट’ पर्युषणविशेषांक,वीर संवत् 2450 (सन् 1924) पृष्ठ13. समस्त दिगम्बर जैन समाज का सहयोग पाकर, अपने समय के कुशलतम नेतृत्व के द्वारा संचालित तीर्थक्षेत्र कमेटी ने धीरे-धीरे एक सम्पूर्ण, सजग और सतर्क, समाज सेवी संस्था का स्वरूप ग्रहणकर लिया था । पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, जब जहाँ आवश्यकता पड़ती, कमेटी वहाँ अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में विलम्ब नहीं करती थी। प्रायः कमेटी को कैसी-कैसी सामयिक औरपेचीदी समस्याओं का सामना करना पड़ता था, कितनी दूरदर्शिता के साथ उनसे निपटना पड़ता था, इसके उदाहरण में मात्र एक घटना का संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। बात सन् 1953 की है ।

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    मैसूर राज्य की ओर से श्रवण बेलगोला में भगवान बाहुबली का महामस्तकाभिषेक आयोजित किया गया था । नाम के लिए वहाँ दोकमेटियाँ गठित कर दी गई थी, पर काम प्रायः सभी शासकीय मशीनरी द्वारा अपने ढंग से हो रहे थे । इसी बीच वह घटना घटित हुई । हुआ यह कि हासन के डिप्टीकमिश्नर, जो महामस्तकाभिषेक की जनरल कमेटी के अध्यक्ष भी थे, उनकी असावधानी से, या मिली भगत से, एक सौ एक रुपए वाले कुछ कलश श्वेताम्बरभाइयों को बेच दिये गये । समझा जाता है कि क्षेत्र के खिलाफ यह कुछ लोगों की सुनियोजित और घातक चाल थी।

    ज्ञात होते ही तीर्थक्षेत्र कमेटी के सदस्यों नेइसका कड़ा विरोध किया । सर सेठ भागचन्द जी सोनी और श्री राजकुमार सिंह जीने भी जगह-जगह से इसके विरोध में आवाज उठाई। उस समय मेले के लिए जो अनेक पूज्य दिगम्बर मुनिराजश्रवणबेलगोला पधार चुके थे, उन्होंने भी इस दुर्भावनापूर्णकदम का तीव्र विरोध किया ।
    श्वेताम्बरों को बेचे हुए कलश वापस नहीं लौटाने कीभी मुनिराजों ने अनशन करने की घोषणा कर दी, तब कहीं डिप्टीकमिश्नर कोबुद्धि आई । उसी समय, अभिषेक के दो दिन पूर्व, 3 मार्च 1953 कोजनरल कमेटी की उसेआवश्यक बैठक बुलानी पड़ी।इस बैठक में, तीर्थक्षेत्र कमेटी के महामंत्री श्री रतनचन्द चुन्नीलालजवेरी के साथ सर सेठ भागचन्दजी सोनी, श्री राजकुमारसिंहजी, लाला पर सादी लालजी पाटनी, सेठ मोहनलाल जी बड़जात्या और पंडित वर्द्धमान पार्श्वनाथ जी शास्त्रीआदि महानुभावों ने उपस्थित होकर डिप्टी कमिश्नर हासन के शरारत भरे कदम का जोरदार विरोध किया और कमेटी में यह निर्णय कराया कि ‘दिगम्बर जैनों के अतिरिक्त जिन अन्य लोगों को कलश बेचे गये हैं, उनकी राशि उन्हें लौटा दी जाय क्योंकि गोम्मटस्वामी के पवित्र मंदिर में दिगम्बर जैनों के अलावा किसी को भी कलश प्राप्त करके अभिषेक करने का, या अन्य अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं है।

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    ‘उस महोत्सव की जनरल कमेटी के कार्यवाही रजिस्टर में यह निर्णय *इनशब्दों में लिखा गया :-“It is inherent in the resolution of the Religious Committee passed on 08.02.1953and ratified by the general Committee on 18.02.1953 that only Digambar Jains have the right of performing Abhishek, but the point is to who could purchase Kalas was not made equally clear. Hence, Somekalsas have been sold to persons who are not Digambar Jains.
    This Committee resolves that the money received for Kalas as from persons who are not DIGAMBAR JAIN may be refunded to them / IT IS NOT CUSTOMARY FOR PERSONS WHO ARE NOT DIGAMBER JAINS, TO PARTICIPATE IN OR PERFORM RUTUAL WORSHIP IN THIS TEMPLE.”

    तीर्थक्षेत्र कमेटी के समक्ष आने वाली समस्याओं का यह एक उदाहरण है।अपने 117 वर्ष के दीर्घ जीवन में, कहाँ-कहाँ, ऐसी कितनी समस्याओं का निराकरण कमेटी के माध्यम से हुआ है, उस सबकालेखा-जोखा प्रस्तुत करना इसछोटे से आले में संभव नहीं है, परन्तु वे सारी घटनाएँ हमारे इतिहास की शिक्षा प्रदकहानियाँ हैं, ऐसा मानकर उनका संकलनऔर प्रकाशन किया जाना आवश्यक है।सर सेठ हुकमचन्द जी के दीर्घ कार्यकाल में श्वेताम्बरों की ओर से अनेकतीर्थों पर बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आई,परन्तु हर जगह, हमेशा उनके बल पर यह कमेटी, ढाल की तरह अपने तीर्थक्षेत्रों का बचाव करने में संलग्न रही । उनकी अध्यक्षता में कमेटी ने संघर्ष और सफलता-असफलता के कई उतार-चढ़ाव देखे ।

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    वास्तव में तीर्थ तो मतों और सम्प्रदायों में निरपेक्ष, हमारी वीतराग साधना के शाश्वत धाम हैं, परन्तु दोनों सम्प्रदायों की ही नासमझी ने, या पक्ष-व्यामोह ने,सम्पत्ति और अधिकारोंके लिए उन पवित्र धर्मायतनों को लेकर परस्पर कलह, द्वेष औरमात्सर्य की खाईं, पगपग पर रच दी है।

    उन्ही पूज्य तीर्थों- सम्मेदशिखर जी, पावापुरी, राजगृही, तारंगा, अंतरिक्ष-पार्श्वनाथ, मक्सी- पार्श्वनाथ,शौरीपुर, कुंभोज-बाहुबली,गिरनार और केसरियाजी आदि अनेक क्षेत्रों पर भाँति-भाँति के उलझन भरे आक्रमणोंका प्रतिकार करने के लिए, इस कमेटी के माध्यम से, समाज को शक्ति और साधनलगाने पड़े हैं ।

    सर सेठ हुकमचन्द जी की अध्यक्षता में लाला जम्बूप्रसाद जी,बैरिस्टरचम्पतराय तथा बाबू अजितप्रसाद जी आदि का सहयोग लेकर कमेटी नेउन प्रहारों का सशक्त प्रतिकार किया ।

    संक्षेप में यही उस आधी शताब्दी का इतिहास है।सर सेठ हुकमचन्द जी के निधन के पश्चात पाँच वर्ष तक कमेटी का संचालन उपाध्यक्षों के द्वारा ही होता रहा । फिर अध्यक्षता का पद 1964 में शिरोमणि साहूशांतिप्रसाद जी को सौंपा गया ।

    उसी समय श्री चन्दूलालकस्तूरचन्द ने महामंत्री काकार्यभार सम्हाला और श्री साहू श्रेयांसप्रसाद जी ने कमेटी के कोषाध्यक्ष का जिम्मेदारियों से भरा पदस्वीकार किया।

    इस पद का बड़ी सूझ-बूझ और सक्षमता केसाथ उन्होंने निर्वाह किया । थोड़े ही दिनों में इन जागरूक, कर्मठ और संकल्पशील पदाधिकारियों ने कमेटी में नव जीवन का संचार कर दिया था

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    तीर्थों का परिचय ग्रन्थ

    भारत के समस्त दिगम्बर जैन तीर्थों का प्रामाणिक और सचित्र परिचय तैयार कराने की आवश्यकता बहुत पहले से अनुभव की जा रही थी । सन् 1957-58 में पं.बलभद्रजी से यह परिचय तैयार कराने के प्रयास किये गये थे परन्तु उस समय यहकार्य नहीं हो सका । साहू शांति प्रसादजी ने उस दिशा में एक सक्षम योजना बनाकरपं. बलभद्रजी को पुनः इस कार्य में नियोजित किया । पाँच जिल्दों में यह महानग्रन्थ तैयार कराकर अपनी भारतीय ज्ञानपीठ के संयोजन एवं
    निर्देशन में तीर्थक्षेत्रकमेटी से उसके प्रकाशन की उन्होंने व्यवस्था कराई । 1988 तक इस ग्रन्थ के पाँचभाग प्रकाशित होचुके थे| तमिलनाडु के तीर्थों का परिचय देने वाले छठवें भाग की तैयारी चल रही है

    सम्मेद शिखर जी का विकास

    साहू शांति प्रसाद जी के कार्यकाल में ही शिखरजी क्षेत्र पर श्वेताम्बर भाईयों के साथ हमारा उग्रतम विवाद चला । उस संकटकाल में श्रीमान्साहूजी की सूझ-बूझ,प्रभाव, धीरज तथा उदारता कमेटी के लिए और समस्त दिगम्बर जैन समाजके लिए वरदान की तरह महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। उस समय श्वेताम्बरों ने अनेक प्रकार के प्रभाव डालकर, बिहार शासन के साथ, पवित्र सम्मेदाचल पर्वत के संबंध में एक पक्षीय समझौता कर लिया था ।

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    साहू शांतिप्रसाद जी ने इसकाशक्त विरोध किया। उन्होंने इस अवैधानिक समझौते के खिलाफ समाज का विरोधप्रदर्शित करने के लिए, अपने नेतृत्व में, पचास हजार दिगम्बर जैन स्त्री-पुरुषों काजुलूस, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर जी शास्त्री के सामने ले जाकर खड़ाकर दिया । समाज के संगठन के बल पर अंततः केन्द्रीय शासन की सहानुभूति प्राप्त करके, तथा बिहार के मुख्यमंत्री पर दबाव डालकर, दिगम्बरों के अधिकारों की रक्षाके लिए एक दूसरा समझौता कराने में शांतिप्रसाद जी सफल हुए । इस समझौते से दिगम्बरों के लिए सम्मेदाचल पर पूजा-प्रभावना के पारस्परिक अधिकारों की सदा केलिए पुष्टि हो गई और पर्वत पर असीमित अधिकार स्थापित करने की श्वेताम्बरों कीचाल विफल हो गई।उस झंझावात में कमेटी की अस्मिता को अखण्डित बनाये रखना, साहू जी जैसे कुशल मार्गदर्शक का ही काम था। हमारे अस्तित्व को चुनौती देने वाले उस आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए सारा दिगम्बर जैन समाज, साहू जी के नेतृत्व में, एक होकर खड़ा हो गया।

    उस समय अनेक तीर्थों की आर्थिक स्थिति अत्यन्तचिंतनीय हो रही थी। जमींदारी उन्मूलन कानून ने, तथा भूमि सीमा और स्वामित्वसंबंधी अनेक स्थानीय कानूनों ने, क्षेत्रों की आय को सीधा प्रभावित किया था। इस आकस्मिक समस्या से शिखरजी की आर्थिक स्थिति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा ।उस विषम परिस्थिति में भी शिखरजी के प्रकरण में हमें विपुल द्रव्य खर्च करना पड़ा।समाज के सहयोग से यद्यपि उसकी पूर्ति होती गई, परन्तु कमेटी के पास पर्याप्त स्थायी- कोष की आवश्यकता का उस समय सभी ने बड़ी तीव्रता से अनुभव किया। सन् 1920 में किया हुआ बीस लाख का संकल्प पचास वर्षों में भी पूरा नहीं किया जा सका था, इससे कुछ निराशा तो होती थी, परन्तु फिर भी एक अच्छे संकल्प की भूमिका समाज में तैयार हो रही थी ।

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    स्थायी निधि का संकल्प

    5 अप्रैल 1969 को कुंभोज-बाहुबली क्षेत्र पर वह शुभ घड़ी प्रगट हुई,जब दिगम्बर जैन समाज ने, तीर्थक्षेत्र कमेटी के लिए, एक करोड़ का स्थायी कोषसंग्रह करने का संकल्प धारण किया। इस महान संकल्प के प्रेरणा-स्त्रोत हैं सौम्यमूर्ति ,परमपूज्य आचार्य श्रीसमन्तभद्रसागरजी महाराज । तीर्थक्षेत्र कमेटी की बैठक को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि ‘वह समय आ गया है जब जैन तीर्थों की सुरक्षा के लिए सारी समाज को सक्रिय हो जाना चाहिए अन्यथा आप अपने कर्तव्य का पालन करने में ऐसी चूककर बैठेंगे जिसका परिमार्जन कभी नहीं हो सकेगा | तीर्थों की रक्षाके लिए एक करोड़ रुपए का धुवफण्ड तीर्थक्षेत्र कमेटी के पास एकत्र होना ही चाहिए।

    यह कार्य कठिन नहीं है । मेरा विश्वास है कि देश का पूरा चतुर्विध संघ-मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका,इस पुण्य संकल्प को पूरा करने के लिए यदिप्रयत्न करेंगे तो यह फण्ड अवश्य एकत्र हो जायेगा ।’इतिहास इस बात का साक्षी है कि धर्म और धर्मायतनों के प्रति कर्तव्य पालन में जब-जब हम गृहस्थों ने प्रमाद किया है, तब-तब हमारे आचार्यों और मुनिराजों| ने अपनी प्रेरणा के द्वारा समाज को अनुप्राणित करके हमारा मार्गदर्शन किया है ।आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने हमें स्थायी निधि एकत्र करने के लिए प्रेरणा औरआशीर्वाद तो दिया ही, अपने शिष्य पूज्य आर्यनन्दी जी मुनिराज को आदेश दिया कि वे समाज के इस संकल्प की पूर्ति के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान करे ।उस दिन कुंभोज में उपस्थित समाज के कर्णधारों ने आचार्यश्री के इस प्रेरणामय उपदेश को ‘गुरु आज्ञा की तरह स्वीकार करके एक करोड़ की स्थायीनिधि एकत्र करने का संकल्प किया । कमेटी के उदारमना अध्यक्ष साहू शांति प्रसादजी ने उसी समय एक लाख रुपए का अपना सहयोग घोषित करके निधिसंग्रह का शुभारम्भ कर दिया ।

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    प्रचारित होते ही सारी दिगम्बर जैन समाज ने कमेटी के इससंकल्प का स्वागत किया। उसकी पूर्ति में समाज का भरपूर सहयोग प्राप्त होनेलगा। स्थायी निधि संग्रह का यह संकल्प, साहूशांतिप्रसाद जी के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों में एक है। इस प्रकार सम्मेदशिखर के विवाद के रूप में तीर्थों के इतिहास की भीषणतमसमस्या सुलझाने के लिए, अत्यन्त विवेकपूर्वक समाज की शक्ति और साधनों का उपयोग करते हुए, एक करोड़ की स्थायी निधि का संकल्प लेकर उसकी उत्साह जनक शुरूआत करते हुएऔर तीर्थक्षेत्र कमेटी के इतिहास में अनेक नवीन परम्पराओं कीस्थापना करते हुए, श्रावक-शिरोमणि साहू शांतिप्रसाद जी ने सन् 1972 में अध्यक्षता का कार्यकाल पूरा किया। उस समय अनेक लोगों ने अगले कार्यकाल के लिए अध्यक्ष पद पर बने रहने का उनसे अनुरोध किया, परन्तु ‘अन्य कार्यकर्ताओं को भी अवसर दिया जाना चाहिए’ यह कहकर उन्होंने सात वर्ष में ही अध्यक्ष पद से विराम ले लिया । संस्था के उत्कर्ष की कामना और पद के प्रति उनके निर्मोह का यह अनुकरणीय उदाहरण था ।
    उन दिनों भगवान महावीर 2500वें निर्वाण कल्याणक महोत्सव के कार्यों में वे अत्यन्त व्यस्त भी हो गये थे ।साहू शांतिप्रसाद जी के उपरान्त सन् 1972 में सेठलालचन्दहीराचंददोशीको कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया ।सन् 1975 में श्री चन्दूलालकस्तूरचन्द महामंत्रीपद से निवृत्त हुए, तब उनका स्थान बम्बई के ही श्री जयंतीभाईलल्लूभाई पारिख नेलिया । परन्तु अनेक कारणों से थोड़े ही समय बाद प्रबंधकारिणी का पुनर्गठन आवश्यक लगने लगा । 7 अप्रैल, 1978 को इन्दौर अधिवेशन में पुनर्गठन के फलस्वरूप महामंत्री पद का गुरुतर भार बाहुबली विद्यालय कुम्भोज के ही सेवा भावीस्नातक हैदराबाद के श्री जयचन्दडी. लोहाड़े को सौंपा गया। मुनिश्रीआर्यनंदीजी महाराज के प्रयत्नों से स्थायी निधि में उस समय तक लगभग 55 लाख रुपयों की स्वीकृतियाँप्राप्त हो गई थी और उसमें से लगभग 18 लाख की राशि कमेटी को प्राप्त भी हो चुकी थी ।

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    संकल्प की पूर्ति

    महामंत्री पद का भार सम्हालते ही श्री लोहाड़े जी ने अपनी पूरी क्षमता केसाथ कमेटी के कार्य में गति लाने के प्रयत्न किये। सभी कार्यकर्ताओं के सहयोग सेसमाज के अधिक से अधिक लोगों का योगदान प्राप्त करने के नवीन प्रयास करके उन्होंने तीर्थक्षेत्र कमेटी को एक व्यापकता प्रदान कर दी । अनेक तीर्थों पर जाकर उनकी समस्याओं का अध्ययन करना तथा तीर्थों के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों केसेमिनार बुलाकर परस्पर संवाद स्थापित कराना, ऐसा अभिनव प्रयोग है जिसने कमेटी को अभूतपूर्व लोकप्रियता और आत्मीयता दिलाई है । तीर्थ-रक्षा निधि के संकलन के लिए श्री लोहाड़े जी ने अपने साथियों के साथ एलोरा, राँची,चम्पापुर,कलकत्ता, जयपुर, बम्बई आदि स्थानों में जाकर गहन जन-संपर्क किया।इस बीचमुनिश्रीआर्यनंदीजी महाराज ने इस संकल्प की पूर्ति के लिए कुछ प्रत्याख्यान किएतथा लगभग बारह वर्ष तक देशभर में प्रायः बीस हजार किलोमीटर भ्रमण करके अस्सी लाख से अधिकराशि के आश्वासन प्राप्त कर लिए थे।उसमें से लगभग एक तिहाई राशि प्राप्त हो चुकी थी ।सन् 1980 में मुनिश्री के बेलगाँव चातुर्मास में वहाँ के उत्साही कार्यकर्ताओं मेंभक्ति पूर्वक यह भावना उत्पन्न हुई कि किसी प्रकार एक करोड़ के आश्वासन प्राप्त करके यथाशीघ्र महाराजश्री के इस संकल्प की संपूर्ति कर दी जानी चाहिए। श्रीलोहाड़े जी ने तत्काल बम्बई जाकर बेलगाँव वासियों की वह भावना कमेटी के पदाधिकारियों और समाज प्रमुखों के समक्ष प्रगट की।इन प्रयासों के फलस्वरूप श्रीसाहू अशोक कुमार जी से और श्री अभयकुमार जी कासलीवाल से पाँच-पाँच लाखतथा श्री धनकुमारठाकोरदासजवेरी और श्री महावीर बी. पाटिल, बेलगाँव से एक-एक लाख रुपए के आश्वासन प्राप्त हुए ।कुछ अन्य आश्वासन भी मिले और पूज्यश्रीआर्यनंदी जी मुनिराज का एक करोड़ का संकल्प पूर्ण हुआ ।इस कार्यकारिणी की यह ऐतिहासिक उपलब्धि रही

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    तीर्थों के विवाद और कमेटी के प्रयास

    यूं देखा जाए तो इस कमेटी का गठन ही तीर्थों के विवादों को सुलझाने, क्षेत्रोंका हिसाब-किताब प्रतिवर्ष जाँच करवा कर प्रकाशित कराने और जिन क्षेत्रों पर प्रबंधसमितियों का गठन नहीं हुआ है, उनका गठन कराने तथा मंदिरों का जीर्णोद्धारकराकर प्रभावना की वृद्धि करने के उद्देश्य से हुआ था । तीर्थक्षेत्र कमेटी की अधिकांश शक्ति तीर्थों के विवाद निपटाने में ही व्यय होता रही है।श्वेताम्बर मूर्ति पूजकसमुदाय के आक्रामक दृष्टिकोण के कारण हमें बाध्य होकर कानूनी कार्यवाही तक करनी पड़ी है। हम नहीं चाहते व्यर्थ में दोनों समाज के रुपयों का अपव्ययहो परन्तु समस्या का निराकरण एक पक्ष के विचार करने से संभव नहीं है । जब-जब हमारे तीर्थों पर अतिक्रमण करने का प्रयास अन्य धर्मावलम्बियों ने किया, तीर्थक्षेत्र कमेटी एक ढाल की तरह सामने खड़ी होकर रक्षा करती आ रही है। तीर्थक्षेत्र कमेटी का इतिहाससाक्षी है कि कई तीर्थक्षेत्रों पर अलग-अलग तरीके से आक्रमण किये गये जिसे रोकने में तीर्थक्षेत्र कमेटी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है । तीर्थक्षेत्र कमेटी की तत्परता से ही ऐसे सभी आक्रमण कारियों को मुँह की खानी पड़ी है। तीर्थों सेसंबंधित कतिपय विवादों को आपस में बातचीत द्वारा सुलझाने के कई बार प्रयत्नकिये गये जो अभी तक कामयाब नहीं हो पाये ।बातचीत का यह सिलसिला अभीतक चल रहा है। वर्तमान में हमारे कई तीर्थक्षेत्रों के विवाद विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन है,जिस में तीर्थाधिराज श्री सम्मेदशिखरजी का विवाद प्रमुख है ।
    इसके अतिरिक्त श्री गिरनारजी क्षेत्र, श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ क्षेत्र सिरपुर, श्री ऋषभदेव(केसरियाजी), श्री पावापुरी क्षेत्र, श्री चंबलेश्वर पार्श्वनाथ क्षेत्र बागूदार,महावीर जी क्षेत्र के विवाद प्रमुख हैं जो विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन रहे हैं ।सम्मेदशिखर क्षेत्र के विवाद का सूत्रपात तब हुआ जब सन् 1901 में सम्मेदशिखरपर्वत की वंदना के लिए जाने-आने वाले

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    तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए दिगम्बरजैन समाज की ओर से सीता नाले से लेकर कुंथनाथटोंक तक सीढ़ी बनाने काकार्य प्रारम्भ कर करीब 500 सीढ़ियां तैयार कर दी गईं थीं। उसके बाद श्वेताम्बरभाइयों ने अपने आदमियों से मिथ्या पक्षपात के वशीभूत होकर रातों-रात सीढ़ियाँ तुड़वा डालीं । दिगम्बर समाज की ओर से जब इसका विरोध किया गया, तब आपसमें फौजदारी भी हुई और उसका मुकदमा भी चला,जिसमें श्वेताम्बर के आदमियों को सजा भी हुई । उन पर खर्च की डिक्री भी मिली और उन्हें सीढ़ी बनाकर देनीपड़ी ।
    इस प्रकार शिखरजी को लेकर सीढ़ी केस, प्रतिष्ठा केस, पिंगरी केस,चढ़ावा केस, कंगलाशाला केस, पट्टा केस, पूजा केस, मेन्सूखी बैनामा केस,नवागढ़ केस, इंजक्शन केस हुए, जिनकी पैरवी तीर्थक्षेत्र कमेटी की ओर से की गई।
    इन केसों में कंगलाशाला केस, पूजा केस और इंजक्शन केस, प्रीवीकाउन्सिल तकलड़े गये । इन केसों की पैरवी के लिए स्व. बाबू चम्पतराय जी बैरिस्टरसाहब ने कईबार अपने निजी खर्च से बिलायत जाने का कष्ट किया और हजारीबाग, रांची वपटना में महीनों रहकर केस की पैरवी की । स्व. बाबू अजित प्रसाद एडवोकेट,लखनऊ ने भी मुकदमों की पैरवी में काफी दिलचस्पी ली ।

    सम्मेदशिखरजी- उच्च न्यायालय राँचीपीठ का ऐतिहासिक फैसला दिनांक 1 जुलाई, 1997

    काफी समय से लंबित शिखरजी तीर्थ के विवाद की अपीलों पर पटना उच्च-न्यायालय की रांचीपीठ के न्यायमूर्ति श्री पी.के.देव ने दिनांक 1 जुलाई,1997को जो ऐतिहासिक फैसला दिया, उसके महत्वपूर्ण अंश निम्न प्रकार है

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    1.सेठ आनंदजी कल्याणजीफर्म,अहमदाबाद के मालिकाना अधिकार के सभीदावे खारिज ।
    2. पर्वत के शिखर भाग पर स्थित टोंको आदि हेतु श्वेताम्बर मूर्तिपूजक समाजद्वारा प्रबंध अथवा नियंत्रण का दावा भी निरस्त । दिगम्बरों के समान अधिकारों कोमान्यता दी गई ।
    3.प्रीवी काउन्सिल के उस फैसले का विशेष उल्लेख जिसमें पर्वत पर दोनों सम्प्रदायों के धर्मायतनों को परिभाषित किया गया है। 21 प्राचीन टोंके(20-तीर्थंकरोंकीटोंकेंऔर एक गौतम गणधर की टोंकसभी दिगम्बर आम्नाय की हैं एवं 4 नई टोंकेंश्वेताम्बरआम्नाय की हैं )।
    4.दिगम्बर जैन यात्रियों के सुविधार्थ पर्वत पर नई धर्मशाला के निर्माण की मांगन्यायसंगत ।
    5.पर्वत की व्यवस्था हेतु बिहार सरकार, दिगम्बर और श्वेताम्बर जैनसमाज के प्रतिनिधियों की संयुक्त कमेटी बनाई जाए ।।

    न्यायमूर्ति श्री पी.के.देव के इस फैसले के विरुद्ध आनंदजी कल्याणजी नेरांची की दुहरी पीठ (खण्डपीठ) के सामने अपील करते हुए स्थगनादेश (स्टे-आर्डर) की मांग की।खण्डपीठ ने आनंदजी कल्याणजी और तीर्थक्षेत्र कमेटी की अपीलों को दाखिल करने की अनुमति तोदे दी परन्तु आनंदजी कल्याणजी के स्टे-आर्डर की माँग को अस्वीकार करते हुए बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह संयुक्त कमेटी का गठन करे, जिसमें दोनोंवर्गों और सरकार के 5-5 प्रतिनिधि हों ।आनंदजी कल्याणजी ने इस फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में विशेष याचिका दायर की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवम्बर1997 को खारिज कर दिया।

    गिरिडीह के सब-ऑर्डीनेट जज श्री चौबे के 30 मार्च, 1990 के असंतोषजनक फैसले के बाद तीर्थक्षेत्र कमेटी ने अपनी नीति को नया मोड़ दिया था और मुकदमों के संचालन का कार्य सीधा अपने हाथ में ले लिया ।इस कार्य में डॉ. डी.के. जैनकी सेवाएं प्राप्त की गई। डॉ. डी.के.जैन ने केस का गहराई से अध्ययन किया औरकेस की पैरवी में महत्वपूर्ण योगदान दिया । फलस्वरूप हमें इस महत्वपूर्ण कार्य मेंसफलता प्राप्त हुई ।

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    सम्मेदशिखर आंदोलन समिति

    दिगम्बर जैन समाज ने तीर्थक्षेत्र की सुरक्षा एवं विकास के लिए अहिंसाआंदोलन चलाने का निर्णय लिया। साथ ही साथ यह भी निर्णय लिया गया कि हमारा आंदोलन सम्पूर्णतः अहिंसक रहेगा । दिनांक 9 मई, 1994 को देश की राजधानी दिल्ली में अखिल भारतीय स्तर पर अहिंसा रैली का आयोजन लाल किलेमैदान से किया गया जिसमें देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में भक्तजन दिल्ली पहुँचे । एक अभूत पूर्व मौन रैली निकाली गई जिसका नेतृत्व कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष साहू अशोक कुमार जैन ने किया । रैली के अंत में समाज के कईनेताओं ने एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए आंदोलन की भूमिका परप्रकाश डाला । उपस्थित जनसमुदाय ने एक स्वर से शिखरजी तीर्थ के प्रति समर्पणभाव व्यक्त करते हुए संकल्प लिया दिगम्बर जैन समाज अपने न्यायोचित अधिकारोंको लेकर ही चैन की साँस लेगा ।
    फलस्वरूप आंदोलन समिति की विधिवत् रचनाकी गई जिसके अध्यक्ष बाबूलाल पाटोदी,कार्याध्यक्ष श्री उम्मेदमलपांड्या एवंकोषाध्यक्ष श्री आर.के. जैन एवं मंत्री श्री सुभाष जैन, दिल्ली को बनाया गया ।
    सम्मेदशिखर जी की रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर पूजा-विधान, णमोकार मंत्र पाठ और भक्तामर स्तोत्र पाठ के कार्यक्रम आयोजित किये गये।देश के विभिन्न भागों में लखनऊ,फरीदाबाद,आगरा,कानपुर,
    बुलंदशहर,खतौली,इन्दौर,रूड़की,नजफगढ़,जयपुर,अलवर,बेलगाँव,सहारनपुर,औरंगाबाद,ललितपुर,देहरादूनबड़ौत,फिरोजाबाद,फर्रुखाबाद,झाँसी,मवाना,मुजफ्फरनगर,धामपुर,ऋषिकेष,फतेहपुर,चंडीगढ़,सतना,भोपाल,सिकन्दराबाद,असम,मेघालय,मणिपुर,सोनीपत,गाजियाबाद,तिजारा,दिल्ली आदि स्थानों में यह कार्यक्रम आयोजित हुए,जिसकी कमान जगह-जगह पर विशिष्ट महानुभावों ने सँभाली ।।

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    धर्मप्रभावना,जागृति एवं एकता का वातावरण बनने पर हमारे अध्यक्ष साहूअशोक कुमार जैन और तत्कालीन महामंत्री श्री अरविन्द रावजी दोशी,आर.के.जैन,डी.यू.जैन, भरतकुमार काला आदि महानुभावो ने महाराष्ट्र के पूना,सातारा,सांगली, कोल्हापुर आदि कई स्थानों पर दौरा किया । शिखरजी तीर्थ के प्रति लोगोंमें अभूतपूर्व भक्ति का वातावरण बना। श्री ताराचन्द प्रेमी ने हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों का दौरा करके करीब 5 लाख रुपये की धनराशि एकत्रित करके हमें भिजवायी ।
    श्रवण बेलगोला के परम श्रद्धेय भट्टारकस्वस्ति श्री चारुकीर्तिमहास्वामी जीकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद से श्री डी.आर.शाह एवं उनके साथियों के प्रयास सेकर्नाटक प्रांत से 9 लाख रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई। बाद में श्री भरत कुमारकाला ने महाराष्ट्र प्रांत के अनेक गाँव,शहरों में जाकर आश्वासन प्राप्त किये,उससे हमें 5 लाख से अधिक की राशि नगद प्राप्त हुई ।
    इसी प्रकार श्री भाऊ साहेब गांधी,सोलापुर ने ढाई लाख रुपये से अधिक राशि प्रदान की । श्री शरद कुमारजैन,भोपाल श्री सुबोध कुमार जैन,जबलपुर श्री स्वरूपचंद जैन मार्सन्स, श्रीशांतिलाल जैन, इन्दौर ने शिखरजी के विकासार्थ राशियाँ एकत्रित कर भिजवाई है।

    सम्मेदशिखरजी का विकास

    मधुबन में शाखा कार्यालय की स्थापना एवं कार्यालय भवन का निर्माण

    श्री सम्मेदशिखर दिगम्बर जैन बीसपंथी कोठी द्वारा उपलब्ध करायी गईजमीन पर शाखा कार्यालय भवन का निर्माण किया गया है । कार्यालय के सुचारु-संचालन के लिए स्टाफ की नियुक्तियाँ भी की गईं ।

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    पारसनाथ पहाड़ पर स्थित सरकारी डाक बंगले में तीर्थयात्रियों के आवास एवं भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था

    कमेटी ने सन् 1983 से शिखर जी पहाड़ स्थित राजस्व विभाग का डाक बंगला किराये पर ले रखाहै। इसकी जीर्ण-शीर्ण स्थिति होने से करीब 7 लाख रुपया व्यय कर उसकाजीर्णोद्धार कराकर आवास एवं भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की गई थी ।

    पहाड़ पर पक्की सड़क, छतरियाँ एवं पुलों का निर्माण

    शिखरजी पहाड़ की वंदना करने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु करीब 30लाख से अधिक राशि व्यय कर पक्की सड़क का निर्माण किया गया है । इस कार्यमें वन विभाग द्वारा समय-समय पर अनेक प्रकार की कठिनाइयों के बावजूद भीसमाज के सहयोग से सड़क का निर्माण कार्य पूर्ण किया गया है और दोनों ओर छतरियों का निर्माण किया गया । रास्ते में 2-3 स्थानों पर बड़े पुलों का निर्माण भीकराया गया है ।

    गंधर्व नाले के पास दिगम्बर जैन भाताघर का निर्माण

    दिगम्बर जैन बीसपंथी कोठी के निजी प्लॉट पर जहाँ से पिछले 70-80 वर्षों से तीर्थयात्रियों को भाता दिया जाता है, वहाँ तीर्थयात्रियों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए उसके नवीनीकरण का कार्य भारतवर्षीय दिगम्बरजैन तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट द्वारा किया गया है । इस कार्य में करीब 15 लाख व्यय हो चुकेहैं । वन विभाग की आपत्ति से निर्माण का कार्य रुका हुआ है ।

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    इस कार्य में साहू जैनट्रस्ट, दिल्ली की ओर से 31 लाख रुपये देने के आश्वासन दिये हैं जिसमें से 24लाख रुपये प्राप्त भी हो गये हैं ।

    तीर्थ वंदना रथ प्रतीक निर्माण योजना

    भारत वर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की हीरक जयंती के अवसर परप्रवर्तित जैन तीर्थ वंदना रथ के समापन पर तीर्थ वंदना रथ का प्रतीक सम्मेदशिखरपर बनाये जाने की योजना के अनुसार दिगम्बर जैन बीसपंथी कोठी से 4.10डिस्मल जमीन पट्टे पर ली गई है, जिस पर तीर्थ वंदना रथ प्रतीक के निर्माण केसाथ-साथ आफिसर्स बंगले बनाये जाने की योजना है परन्तु कुछ कानूनी विवाद उत्पन्न होने से यह कार्य रुका हुआ है ।

    पारसनाथ पहाड़ स्थित टोंकों की सुरक्षा-व्यवस्था एवं जीर्णोद्धार

    न्यायालय द्वारा दिगम्बर जैन समाज को शिखर जी की प्रबंध व्यवस्था मेंबराबर का हक दिये जाने के बाद तीर्थ को मूल रूप से सुरक्षित रखने तथा उसकी पूजा-प्रक्षाल नियमित होती रहे, इसके लिए सुरक्षा गार्डों एवं पुजारियों की नियुक्तिकी गई है। टोंकों पर दान पेटियाँ,जिनवाणी तथा पूजन सामग्री रखने के लिए स्टील की अलमारी पारसनाथटोंक पर रखी गई है ।

    शिखर जी कीटोंकों के लिए स्थायी पूजन फण्ड, आरती फण्ड एवंअखण्ड ज्योति फण्डयोजनाः

    तीर्थक्षेत्र कमेटी ने पारसनाथटोंक पर स्थायी पूजन फण्ड, आरती फण्ड एवंअखण्ड ज्योति

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    फण्ड की योजना प्रारम्भ की गई है जिसके अंतर्गत समाज के श्रद्धालु बंधु न्यौछावर राशि प्रदान कर उसके सदस्य बन रहे हैं

    दिगम्बर जैन शाश्वत तीर्थराजसम्मेदशिखर ट्रस्ट का गठन

    शिखरजी तीर्थ और वहाँ उत्पन्न परिस्थितियों को देखते हुए तीर्थक्षेत्र कमेटीद्वारासन् 1997 में इस ट्रस्ट का गठन इस क्षेत्र के निवासियों, वहाँ के आसपास रहने वाले आदिवासियों के कल्याण और विकास के लिए तथा देश के कोने-कोनेसेआने वाले तीर्थयात्रियों के आवास आदि की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य सेस्व.साहूअशोक कुमार जैन की प्रेरणा व परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी मुनिराज के आशीर्वाद से किया गया ।यह प्रसन्नता की बात है कि ट्रस्ट मण्डल के कुशल नेतृत्व में संस्था ने अच्छी प्रगति की है । यात्रियों की सुख सुविधा को दृष्टि में रखकर आवास एवं शुद्ध भोजन की व्यवस्था शाश्वत ट्रस्ट द्वारा की जा रही है ।इस ट्रस्ट के सड़क के दूसरी ओर 10 हजार वर्ग गज भूमि और क्रय की गई है, उसमें शाश्वत विहार के रूप में योजना बद्ध तरीके से यात्री निवास, त्यागी निवास, साध्वीनिवास, स्वागत कक्ष आदि का निर्माण किया गया है।ट्रस्ट मण्डल मेंकुल 35 सदस्य होते हैं जिसमें 17 न्यासियों का चयन भारत वर्षीय दिगम्बर जैनतीर्थक्षेत्र कमेटी करती है तथा तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष इस ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष एवं तीर्थक्षेत्र कमेटी के महामंत्री इस ट्रस्ट के पदेन सदस्य बनते हैं ।

    तीर्थक्षेत्र कार्यकर्ता प्रशिक्षण योजना (श्री द्रोणगिरिसिद्धक्षेत्र पर प्रबंधनप्रशिक्षण का संचालन)

    समाज के चुनिंदा सेवाभावी नवयुवकों को प्रशिक्षित कर धर्मायतनों की सेवा,सुरक्षा में लगाने

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    के उद्देश्य से दिनांक 20 जून 1999 से यह योजना श्री दिगम्बर जैनसिद्धक्षेत्रद्रोणगिरि में प्रारम्भ की गई है।क्षेत्र के अध्यक्ष श्री कपूरचन्दघुवारा एवंमंत्री श्री भागचन्द जैन, इसमें काफी रुचि ले रहे हैं | जैन क्षेत्रों के प्रबंधन, विधि-विधान, पूजा आदि विषयों पर आधुनिक प्रशिक्षण देकर नवयुवकों को प्रोत्साहितकिया जा रहा है जिसमें प्रतिवर्ष अनेक कार्यकर्ता प्रशिक्षण प्राप्त कर देश के कोने-कोने में फैले मंदिरों/संस्थाओं में अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं ।

    तीर्थ वंदना रथ का प्रवर्तन

    भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की हीरक जयंती के अवसर पर प्रवर्तित तीर्थ वंदना रथ मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश,कर्नाटक,महानगर मुंबई एवं गुजरात में इसका प्रवर्तन हुआ है जिससे समाज में तीर्थों के प्रति भक्ति भावना में अभिवृद्धि के साथ-साथ तीर्थक्षेत्र कमेटी को आर्थिकबल भी मिला है ।।

    भगवान गोमटेशमहामस्तकाभिषेक महोत्सव एवं श्री बावनगजा (बड़वानी)क्षेत्र के महामस्तकाभिषेक के अवसर पर चित्र प्रदर्शनी का भव्यआयोजन

    उक्त दोनों महामस्तकाभिषेक के अवसर पर विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की चित्र प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसका हमारे सभी त्यागीव्रतियोंव देश के कोने-कोने से पधारे हुएलाखों तीर्थभक्तों ने अवलोकन कर देश के विभिन्न तीर्थों के बारे में न केवलजानकारी प्राप्त की, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा करने का मन भी
    बनाया। तीर्थक्षेत्र कमेटी के इस अनूठे प्रयास को बहुत सराहना प्राप्त हुई।

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    क्षेत्रों की वेबसाइट बनाने की योजना

    तीर्थ हमारी सांस्कृतिक धरोहर एवं धार्मिक ऊर्जा के केन्द्र हैं, जिनकी जीवनमें एक से अधिक बार वंदना करने का भाव प्रत्येक श्रावक के मन में होता है ।ऐसी स्थिति में वहाँ तक पहुंचने, दर्शन-वंदन करने तथा उसके आसपास के दर्शनीयस्थल के बारे में जानकारी रखने के भाव हर श्रावक के मन में तीव्र हो
    जाते हैं । आजके इस वैज्ञानिक युग में जहाँ देश 21वीं सदी के आगे बढ़ रहा है वहाँ आधुनिक जानकारी एवं सुविधा भी चाहता है । श्रावकों कीभावना को दृष्टिगत करते हुए।।

    तीर्थक्षेत्र कमेटी ने तीर्थों की आधुनिकतम जानकारी का लेखन किया गया एवं विभिन्न तीर्थक्षेत्रों के अच्छे चित्र खींचने के लिए पेशेवरफोटोग्राफर की नियुक्ति भी की गई।

    स्क्रिप्ट लेखन का कार्य भी साथ-साथ चलतारहा। उस समय वेबसाइट तैयार करने का दायित्व श्रीमान् प्रेम सेठी को सौंपा गया था ।
    वेबसाइट का पता है-VisitWWW.digamberjainteerth.Com

    जैन तीर्थ वंदना मासिक पत्रिका का प्रकाशन

    तीर्थक्षेत्र कमेटी के बढ़ते उत्तरदायित्वों एवं समग्र जैन समाज कीआकांक्षाओंअपेक्षाओं को देखते हुए सन् 1983

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    से तीर्थक्षेत्र कमेटी के मुखपत्र के रूप में ‘तीर्थवंदना और उसके बाद नये कलेवर में ‘जैन तीर्थ वंदना’ का प्रकाशन हो रहा है ।इस पत्रिका को नये कलेवर में और अधिक आकर्षक, ज्ञानवर्द्धक,सूचनात्मक एवंरोचक सामग्री से परिपूर्ण कर एक पारिवारिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित किया जारहा है। वर्तमान में इसकी 5000 प्रतियाँ छपाकर तीर्थक्षेत्र कमेटी के सदस्यों को प्रतिमाह निःशुल्क भेजी जा रही है।

    इसके अतिरिक्त तीर्थक्षेत्र कमेटी से जुड़े शाश्वत ट्रस्ट के सदस्यों को, पत्र-पत्रिकाओं को, संस्थाओं, मंदिरों को निःशुल्क उपलब्धकरायी जा रही है।

    आंचलिक समितियों का गठन

    भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की नियमावली की धारा 11 के अनुसार कमेटी के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी अंचल, किसी एक प्रदेश अथवाएकाधिक प्रदेशों को मिलाकर अंचलीय समितियों के गठन का प्रावधान है, यह समितियां उस अंचल में कमेटी के समस्त सदस्यों द्वारा गठित की जाती है।आंचलिक समितियों के लिए भारतवर्षीय दिगम्बरजैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की पदाधिकारीपरिषद द्वारा एक नियमावली स्वीकृत की गई है जिसके अनुसार कमेटी के अध्यक्ष केचुनाव के 6 महीने के भीतर अंचलीय समिति के अध्यक्षों का चुनाव होने का प्रावधानहे । तदनुसार समय-समय पर आंचलिक समिति के अध्यक्षों के चुनाव होते रहे है ।

    वर्तमान में भी राजस्थान अंचल, तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल एवं आंध्रप्रदेशअचल, पूर्वाचल, महाराष्ट्र अंचल, गुजरात अंचल एवं मध्यांचल समितियों केअध्यक्षों के चुनाव सम्पन्न हुए है।

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    Representatives

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    तीर्थक्षेत्र

    आंचलिक समितियों का गठन

    भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की नियमावली की धारा 11 केअनुसार कमेटी के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी अंचल, किसी एक प्रदेश अथवाएकाधिक प्रदेशों को मिलाकर अंचलीय समितियों के गठन का प्रावधान है, यह समितियां उस अंचल में कमेटी के समस्त सदस्यों द्वारा गठित की जाती है ।आंचलिक समितियों के लिए भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की पदाधिकारीपरिषद द्वारा एक नियमावली स्वीकृत की गई है जिसके अनुसार कमेटी के अध्यक्ष केचुनाव के 6 महीने के भीतर अंचलीय समिति के अध्यक्षों का चुनाव होने का प्रावधानहे । तदनुसार समय-समय पर आंचलिक समिति के
    अध्यक्षों के चुनाव होते रहे है ।
    वर्तमान में भी राजस्थान अंचल, तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल एवं आंध्रप्रदेशअचल, पूर्वाचल, महाराष्ट्र अंचल, गुजरात अंचल एवं मध्यांचल समितियों केअध्यक्षों के चुनाव सम्पन्न हुए है।

    तीर्थक्षेत्र सर्वेक्षण योजना

    इस योजना के अंतर्गत क्षेत्र की चल-अचल सम्पत्ति और स्वामित्व सिद्ध करनेवाले दस्तावेजों, ग्राम पंचायत के संपति कर के कागज, सनद, सोने-चांदीकी मूर्ति तथा वस्तुओं की सूची, शिलालेख, अंकेक्षित तुलन पत्र (हिसाब किताब),न्यास अधिनियम केअंतर्गत हुए पंजीकरण प्रमाण-पत्रट की सत्य प्रतिलिपियों के साथ, इसके लिएछपाये गये तीर्थ सर्वेक्षण फार्म को भरकर संबंधित कागजातों के साथ तैयार कियाजाता है । महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान के तीर्थक्षेत्रों का सर्वेक्षण करने के बादमध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया है । कई क्षेत्रों का सर्वेक्षण होना बाकीहै । कुछ नये क्षेत्र सम्बद्ध हुए हैं उनका भी सर्वेक्षण होना है जिसका प्रयास चल रहा है।

    धर्मशाला

    कार्य और कार्यालय

    मुंबई स्थित हीराबाग धर्मशाला में सेठ माणिकचंदहीराचंद ट्रस्ट की ओर सेभारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी एवं ट्रस्ट के कार्यालय के लिए नि:शुल्करूप से स्थान उपलब्ध कराया हुआ है। इतना ही कमेटी के स्थापनाकाल से इस ट्रस्टकी ओर से रु. 5000/- की राशि तीर्थक्षेत्र कमेटी को आवर्तक व्यय हेतु प्रदान की जा रही है ।

    सन् 1970 में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था उसके बाद गत वर्ष पूर्वअध्यक्ष श्री नरेश कुमार सेठी के अध्यक्षीय कार्यकाल में इसका जीर्णोद्धार कराकरउसे वातानुकूलित करके नयेफर्नीचर से सुसज्जित किया गया है। रेकॉर्ड रूम कोआवश्यकतानुसार नया फर्नीचर खरीदकर सुसज्जित कराकर उसमें सभी आवश्यकअभिलेख को सुरक्षित रखा गया है।

    • तीर्थक्षेत्र कमेटी की स्थापना के समय से चुने गये सभासद

      1. स्याद्वादवारिधिपं. गोपालदास जी बरैया, मुरैना (ग्वालियर)
      2. श्री बाबू अण्णाजीपाटिल, बी.ए.मजिस्ट्रेट- कोल्हापुर
      3. श्री लाला सलेखचन्दजी रईस, नजीबाबाद (बिजनौर)
      4. श्री लाला किशोरीचन्द जी, रावलपिण्डी
      5. श्री शाह जयसिंह भाई- सेकण्ड मजिस्ट्रेट, आमोद(भरोच)
      6. श्री पारिखलल्लूभाईप्रेमानन्दएल. सी.ई., मुंबई
      7. श्री सेठमाणिकचन्दपानाचन्द जी जवेरी, मुंबई
      8. श्री सेठचुन्नीलालझवेरचन्द, मुंबई ।
      9. श्री दिलसुखरायरघुनाथदास जी रईस, सरनौ
      10. श्री शाह शंकरलाल जी गांधी, आमोद
      11. श्री लाला मुंशीलाल जी, एम.ए., लाहोर
      12. श्रीमंत सेठ मोहनलालमथुरादास जी, खुरई
      13. श्री राजा ज्ञानचन्द जी मुसविरजंग, सिकन्दराबाद (हैदराबाद)
      14. श्रीमंत सेठ गोपाल शाह पूरणमल शाह आ.मेजि., सिवनी
      15. श्री भाऊतात्याचिवटे, कुरुंदवाड़

    • 16. श्री सेठ मथुरादासजी, ललितपुर
      17. श्री लाला देवीदासजी, चौक बाजार, लखनऊ
      18. श्री सेठ सर्वसुखदास जी खजांची, जयपुर
      19. श्री लाला हुलासरायजीरूपचंदजी रईस, सहारनपुर
      20. श्री सेठहरसुखदासजीऑ.मजि., हजारीबाग
      21. श्री सेठ दामोदरदासजी, मथुरा
      22. श्री सेठ धनप्रसाद जी, बण्डा
      23. श्री शाह लालचन्दकहानदास, बड़ौदा
      24. श्री सेठ सेवाराम जी , उज्जैन
      25. श्री भ.म.श्रीचारुकीर्तिजीपण्डिताचार्य, मूडबद्री
      26. श्री बा. धन्नूलालजी अटॉर्नी, कोलकाता
      27. श्री सेठ अमोलकचन्दजी, इन्दौर
      28. श्री भाई दरयावसिंहजीसोधिया, इन्दौर
      29. श्री गांधी बहालचंद जी, सोलापुर
      30. श्री हजारीमलकिशोरीलालजीऑ.मजिस्ट्रेट, गिरिडीह
      31. श्री एम.अनंतराजैया (म्युनिसिपल कमिश्नर, मैसूर)।
      32. श्री रामसरूपजीछपरमुहरा, कानुपर
      33. श्री बाबू बनारसीदासजीएम.ए.एल.एल.बी., सहारनपुर
      34. श्री ब्र. रामचन्दजीदक्षिणदेश।
      35. सेठ हिराचंदनेमीचंदजीऑन. मजिस्ट्रेट, सोलापुर
      35. सेठ हिराचंदनेमीचंदजीऑन. मजिस्ट्रेट, सोलापुर

    • 36. श्री लाला चिरंजीलाल जी जवेरी, दिल्ली
      37. श्री सेठगुरुमुखरायसुखानन्दजी, मुंबई
      38. श्री फूलचन्दजी पाटनी, मुंबई
      39. श्री रा.रा. रामासावजी, वर्धा
      40. श्री सुखलालजीऑन.मजिस्ट्रेट म्युनिसिपल वाइसप्रेसीडेन्ट,
      छिन्दवाड़ा
      41. श्री बाबू देवकुमारजी रईस ऑन.मजिस्ट्रेट, आरा
      42. श्री बाबू बच्चूलालजी रईस ऑन.मजिस्ट्रेट, आरा
      43. श्री सेठ नेमलालजीपासूसाब, नागपुर
      44. श्री मोतीचन्दमाणिकचन्दजी मोदी, रोपला
      45. श्री शाह वालचंदसखाराम, मोहोल, सोलापुर
      46. श्री लखमीचन्दखुशालचन्द, बागधरी, सोलापुर
      47. श्री अण्णाप्पाफन्नप्पाचौगुले वकील, बेलगाँव
      48. श्री लाला सुल्तानसिंहजीअ.म., दिल्ली
      49. श्री लाला स्नेहीलालजीअमीरसिहजी, दिल्ली
      50. श्री बाबू प्यारेलालजी वकील, दिल्ली
      51. श्री लाला ईश्वरीप्रसादजी रईस ऑन. मजिस्ट्रेट म्युनि.कमिश्नर
      गवर्नमेंटट्रेझरर बड़ा दरीबा, दिल्ली
      इसके बाद इस प्रबंध समिति में समय-समय पर और नये सदस्यों कोजोड़ा गया
      है ।

      सेठ हुकमचंदजी

      सेठ हुकमचंदजी कासलीवाल का परिचय

      इंदौर। दुनिया भर में प्रसिद्ध और विवादास्पद संत ओशो यानी रजनीश ने एक प्रवचन में इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद का जिक्र बड़े ही रोचक अंदाज में किया था। ओशो ने उन्हें उस समय के दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बताया था। उस जमाने में सेठ हुकुमचंद के नाम का डंका इंदौर से लेकर लन्दन के स्टॉक एक्सचेंज तक बजता था। उनकी आलीशान हवेली आज भी उनके गौरव की कहानी कहती है।14 जुलाई को सेठ हुकुमचंद का जन्मदिन है।।

      – इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद का नाम भारत की पहली पीढ़ी के उद्योगपतियों में लिया जाता है। उन्होंने सन 1917 में कोलकाता में देश की पहली भारतीय जूट मिल की स्थापना की थी। कोलकाता में उनकी एक स्टील मिल भी थी। इसके अलावा उन्होंने इंदौर में तीन कपड़ा मिलें (राजकुमार, कल्याणमल और हुकुमचंद मिल )और एक शेविंगब्लेड बनाने का कारखाना भी लगाया था। इंदौर की हुकुमचंद मिल उस जमाने की सबसे आधुनिक कपड़ा मिल थी।

      – 1940 के दशक में उन्होंने मुंबई में वल्कन के नाम से एक साधारण बीमा कंपनी की स्थापना की थी। उज्जैन में भी उनकी एक कपड़ा मिल थी। इसके अलावा इंदौर,खंडवा, सेंधवा और भीकनगांव में जीनिंग और प्रोसेसिंगइकाइयाँ भी थीं।

      – उनके कारोबार और उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आचार्य रजनीश, ओशो ने अपने एक प्रवचन में उन्हें उस समय के दुनिया
      के सबसे अमीर लोगों में से एक बताया था। इसका जिक्र ओशोबाइबिल नामक किताब के आठवे खंड में है। इसमें ये भी जिक्र है कि सेठ हुकुमचंद के पास सोने की रोल्सरॉयस कार थी। इस कार के कुछ फोटो आज भी ऑटोमोबाइल्स की कुछ वेबसाइटों पर देखे जा सकते है। उन्होंने भगवान महावीर की रथयात्रा के लिए सोने का एक रथ भी बनवाया था।

      – उनके रसूख का आलम ये था कि लंदनस्टाक एक्सचेंज के दलालों को जब ये पता चलता था कि वे किसी कंपनी के शेयर खरीद रहें हैं तो उस कंपनी के शेयर के भाव आसमान छूने लगते थे। आजादी के पहले उनकी गिनती टाटा और बिड़ला के बराबर होती थी।इंदौर के महाराजा होलकर अपने दरबार में उन्हें अपने साथ की कुर्सी पर बैठाते थे।तत्कालीन होलकर राजा के कहने पर उन्होंने अंग्रेजों को करोड़ों रूपए का कर्जा बिना ब्याज के दिया था। इसके चलते अंग्रेजों ने उन्हें सर और महाराजा होलकर ने राजा राव की उपाधि से सम्मानित किया था।

      – भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी, बनारस का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, इंदौर का कस्तूरबाग्राम, नसिया धर्मशाला, प्रेमदेवी अस्पताल और कांच मंदिर और दिल्ली के लेडीहार्डिंगमेडिकलकॉलेज सहित देश भर में 200 से ज्यादा स्कूल,कॉलेज, मंदिर, धर्मशाला, अस्पताल और होस्टल बनाने के लिए उन्होंने दान किया था। एक आकलन के अनुसार 1950 तक उन्होंने करीब 80 लाख रुपए का दान किया था।

      – इंडेक्सिंग और इन्फ्लेशनरेट के आधार इसकी गणना की जाए तो ये रकम आज के 4200 करोड़ के बराबर होती है। उनका महल किसी राजा महाराजा की तरह था। इसके भीतर सोने की नक्काशी की गई है। उनके वंशज आज भी यहीं रहते हैं। मूल फर्म सेठ हुकुमचंदसरूपचंद प्राइवेट लिमिटेड अभी भी कायम है। अपनी उद्यमिता, दूरदृष्टि और नेतृत्व से दुनिया भर में अपनी धाक जमाने वाले इस महान उद्योगपति का जिक्र केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की किताबों में देश के महान उद्योगपतियों में किया गया है।

      सर सेठ हुकुमचंद का यह अमूल्य योगदान है

      एक समय था जब इंदौर मिलों के लिए जाना जाता था। कई मिलें थी और इसी के कारण टेक्सटाइल में शहर का नाम देशव्यापी स्तर पर था। आज इंदौर व्यावसायिक रूप से जितना समृद्ध और विकसित हुआ है, उसमें सर सेठ हुकुमचंद का बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

      उन्होंने सूती उद्योग की शुरुआत की थी। उन्हें कॉटनकिंग कहा जाता था। इस उद्योग के लिए उन्होंने इंग्लैड से मशीनें मंगाई थी। उनका शहर के आर्थिक विकास में तो योगदान था ही, साथ ही सामाजिक क्षेत्र में उनका योगदान था।

      मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के सम्मेलन में जब महात्मा गांधी इंदौर आए थे, इसी सम्मेलन में उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा की थी। तब सर सेठ हुकुमचंद ने समिति को सहयोग भी दिया था। उन्हीं के निमंत्रण पर महात्मा गांधी उनके घर भी गए थे। यहीं गांधीजी के कहने पर सर सेठ हुकुमचंद ने बहुत बड़ी ज़मीन दान दी थी जहां कस्तूरबाग्राम बनाया गया। आज यह महिलाओं के शैक्षणिक-सामाजिक उत्थान का बड़ा केंद्र है।

      जहां तक मिलों का सवाल है तो यहां की एक मिल में मशहूर चित्रकार एम.एफ. हुसैन के पिता टाइम कीपर की नौकरी किया करते थे। एम.एफ. हुसैन ने न केवल होलकरों को खूबसूरत पेंटिंग्स की हैं बल्कि उन्होंने सर सेठ हुकुमचंद के रेखांकन और पेंटिंग्स बनाई थी जो आज धरोहर है।

      पदाधिकारीगण

      भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के
      भूतपूर्व ववर्तमान पदाधिकारीगण

      • परम संरक्षक कालावधि
        धर्माधिकारी श्री वीरेन्द्र हेगड़े, धर्मस्थल १९९२ से आज तक
        श्री नरेशकुमार सेठी, जयपुर जुलाई, २००८ से आज तक
        श्री अशोक कुमार पाटनी, मदनगंज-किशनगढ़ जुलाई,२००८ से आज तक
        श्री आर. के.जैन, मुम्बई अगस्त-२०१३ से आज तक
        स. सिंघई श्री सुधीर जैन, कटनी फरवरी-२०१६ से आज तक
        श्रीमती सरिता एम.के. जैन, चैन्नई नवम्बर २०१८ से आज तक
      • अध्यक्ष कालावधि
        १. स्व. सर सेठ हुकुमचन्दजी जैन (कासलीवाल), इन्दौर १९१० से १९५९ तक
        २. स्व.श्री साहू शांतिप्रसाद जैन, मुंबई १९६४ से १९७२ तक
        ३. स्व.श्रीमान् सेठ लालचन्द हिराचंदजी, मुंबई १९७२ से १९८३ तक
        ४. स्व.श्री साहू श्रेयांसप्रसाद जैन, मुंबई १९८३ से १९८७ तक
        ५. स्व.श्री साहू अशोक कुमार जैन, नई दिल्ली १९८७ से ४ फरवरी १९९९ तक
        ६. स्व.श्री साहू रमेशचन्द जैन, नई दिल्ली ११ अप्रैल, १९९९ से २२ सितम्बर,२००४ तक
      • अध्यक्ष कालावधि
        ७. श्री नरेश कुमार सेठी, जयपुर १७ अक्टू.२००४ से २२ जून, २००८ तक
        ८. श्री आर.के.जैन, मुंबई २२ जून,२००८ से २५ अगस्त २०१३ तक
        ९. स. सिंघई श्री सुधीर जैन, कटनी २५ अगस्त २०१३ से २५ फरवरी २०१६ तक
        १०. श्रीमती सरिता एम.के.जैन, चैन्नई २५ फरवरी २०१६ से २५ नवम्बर २०१८ तक
        ११. श्री प्रभातचंद्र एस.जैन, मुम्बई २५ नवम्बर २०१८ से आज तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        १. स्व. सेठ गुलाबचन्द हिराचन्दजी दोशी, मुम्बई
        २. स्व.धर्मवीर सेठ सर भागचन्द सोनी, अजमेर अगस्त १९७५ से १९८३ तक
        ३. स्व.श्री रा.ब.राजकुमार सिंह , इन्दौर १९७५ से १९८७ तक
        ४. स्व.श्री सेठ रतनचंद चुनीलाल जवेरी, मुंबई १९६४ से १९८१ तक
        ५. स्व.श्री शांतिप्रसाद जैन, नई दिल्ली १९७२ से १९७७ तक
        ६. स्व.श्री सेठ लालचन्द हिराचंदजी, मुंबई १९८३ से १९९३ तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        ७. स्व.श्री साहू श्रेयांसप्रसाद जैन, मुंबई १९८७ से १९९२ तक
        ८. स्व.श्री साहू अशोक कुमार जैन, नई दिल्ली १९८३ से १९८७ तक
        ९. स्व.श्री रा.ब.सेठ हरकचंद जैन, रांची १९७५ से १९९२ तक
        १०. स्व.श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल,इन्दौर १९८३ से मई २००३ तक
        ११. श्री अरविन्द रावजी दोशी, मुंबई १९८२ से १९९२ तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        १२. धर्माधिकारी श्री वीरेन्द्र हेगड़े, धर्मस्थल १९८३ से १९९२ तक
        १३. स्व.श्री ज्ञानचन्द खिन्दूका, जयपुर १९८७ से १९९५ तक
        १४. स्व.श्री रतनलाल गंगवाल, नई दिल्ली नवम्बर १९९२ से अगस्त १९९४ तक
        १५. स्व.श्री जयचन्द डी. लोहाड़े, हैदराबाद नवम्बर १९९२ से मार्च २००१ तक
        १६. स्व.श्री उम्मेदमल पांड्या, दिल्ली नवम्बर १९९२ से नवम्बर २००१ तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        १७. स्व.श्री शरदकुमार जैन, मुंबई फरवरी,१९९५ से २००८ तक
        १८. श्री शिखरचन्द पहािड़या, मुंबई २३ जुलाई, २००८ से अक्टूबर १३ तक
        १९. श्रीमती सरिता जैन, चेन्नई २३ जुलाई, २००८ से अक्टूबर १३ तक
        २०. श्री वसंतलाल एम. दोशी, मुंबई २३ जुलाई, २००८ से अक्टूबर १३ तक
        २१. श्री गणेशकुमार राणा, जयपुर २३ जुलाई, २००८ से अक्टूबर १३ तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        २२. श्री महावीर प्रसाद सेठी, सरिया २३ जुलाई, २००८ से ९ जुलाई १६ तक
        २३. श्रीमती सरिता एम.जैन, चैन्नई अक्टूबर २०१३ से २५ फरवरी १६ तक
        २४. श्री हुकम हरकचंद जैन काका, कोटा ११ दि. २०१६ से १५.२०१८ तक
        २५. श्री नीलम चंपराय अजमेरा, उस्मानाबाद २० अक्टूबर २०१३ से १५दिसम्बर २०१८
        २६. श्री वसंतलाल एम.दोशी, मुम्बई २० अक्टूबर २०१३ से आज तक
      • उपाध्यक्ष कालावधि
        २७. श्री प्रदीप नेमीचंद जैन, पी.एन.सी, आगरा २० अक्टूबर २०१३ से आज तक
        २८. श्री पंकज जैन, दिल्ली २५ फरवरी २०१६ से १५ दि.२०१८ तक
        २९. श्री शिखरचन्द पहािड़या, मुम्बई १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        ३०. श्री गजराज गंगवाल, दिल्ली १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        ३१. श्री तरुण काला, मुम्बई १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
      • कोषाध्यक्ष कालावधि
        १. स्व.श्री सेठ गुरुमुखराय सुखानन्दजी, मुंबई १९०६ से १९३१ तक
        २. स्व.ठाकोरदास पानाचंद जवेरी, मुंबई १९४३ से १९६२ तक
        ३. स्व. साहू श्री श्रेयांसप्रसाद जैन, मुंबई १९६४ से १९८३ तक
        ४. स्व. श्री धनकुमार ठाकोरदास जवेरी, मुंबई १९८३ से जुलाई २००२ तक
        ५. श्री जम्बूकुमारसिंह कासलीवाल, मुंबई मई २००३ से जून २००८ तक
        ६. श्री प्रभातचन्द्र सवाईलाल जैन, मुंबई २३ जुलाई, २००८ से २५ अक्टूबर २०१३ तक
      • कोषाध्यक्ष कालावधि
        ७. श्री शिखरचंद पहािड़या, मुम्बई २० अक्टूबर २०१३ से १५ दिसम्बर २०१८
        ८. श्री के.सी.जैन, सी.ए., मुम्बई १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        महामंत्री कालावधि
        १. श्री स्व.सेठ माणिकचंदजी जवेरी, मुंबई १९०६ से १९१३ तक
        २. श्री स्व.लाला भागमल प्रभुदयालजी, मुंबई १९१४ से १९१७ तक
        ३. स्व.श्री तीर्थभक्त रतनचंद चुनीलाल जवेरी १९२० से १९६३ तक
      • महामंत्री कालावधि
        ४. स्व.श्री चन्दूलाल कस्तूरचंद जी १९६४ से १९७६ तक
        ५. स्व.श्री जयंतीलाल एल. परिख, मुंबई १९७६ से १९७८ तक
        ६. स्व.श्री जयचन्द डी. लोहाड़े, हैदराबाद १९७८ से नवम्बर १९९२ तक
        ७. श्री अरविन्द रावजी दोशी, मुंबई नवम्बर १९९२ से जून २००८ तक
        ८. श्री चk्रÀेश जैन, नई दिल्ली जुलाई, २००८ से २५ अक्टूबर १३ तक
      • महामंत्री कालावधि
        ९. श्री पंकज जैन, दिल्ली २५ अक्टूबर १३ से २५ फरवरी १८तक
        १०. श्री संतोष जैन पेंढारी, नागपुर २५ फरवरी २०१६ से १५ दि. २०१८ तक
        ११. श्री राजेन्द्र के. गोधा, जयपुर १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        मंत्री कालावधि
        १. स्व. सेठ लल्लूभाई लखमीचन्दजी चौकसी, मुम्बई सन् १९०६ से १९२३ तक
        २. स्व. श्री बा. रघुनाथदास जी, सरनाँ सन् १९०६ से १९२३ तक
      • मंत्री कालावधि
        ३. स्व. श्री ठाकरसी निहालचन्द जी, मुम्बई सन् १९०६ से १९२३ तक
        ४. स्व. बा. बलदेवदासजी, कलकता सन् १९०६ से १९२३ तक
        ५. स्व. सेठ ठाकोरभाईजी जवेरी, मुम्बई १९४३ से १९६२ तक
        ६. स्व. श्री जयंतीलाल लल्ल्ाूभाईजी परिख, मुम्बई १९५२ से १९७८ तक
        ७. स्व. श्री चिमनलाल गोपालदास जी बखारिया १९५२ से ….
      • मंत्री कालावधि
        ८. स्व. सेठ चन्दूलाल कस्तूरचंद जी शाह, मुम्बई १९६४ से १९८३ तक
        ९. स्व. धनकुमार ठाकोरदासजी जवेरी, मुम्बई १९६४ से १९८३ तक
        १०. स्व. श्री रावसाहेब जिवराजजी शाह, मुम्बई १९७८ से १९९२ तक
        ११. स्व. श्री सी.जे.बंडी एडवोकेट, मुम्बई १९८२ से नवम्बर १९९२ तक
        १२. स्व. श्री रमेशचंदजी जैन (पी.एन.मोटर्स), नई दिल्ली १९८७ से नवम्बर, १९९२ तक
      • मंत्री कालावधि
        १३. स्व. श्री जम्बूकुमारसिंहजी कासलीवाल, मुम्बई १९७८ से मई २००५ तक
        १४. श्री वसंतलाल एम.दोशी, मुम्बई नवम्बर १९९२ से जून २००८ तक
        १५. श्री भागचन्द जी जैन, कोलकाता मई २००३ से जून २००८ तक
        १६. श्रीमति सरिता जैन, चैन्नई मई २००३ से जून २००८ तक
        १७. श्री शरद जैन, भोपाल मई २००३ से जून २००८ तक
      • मंत्री कालावधि
        १८. श्री सुरेश जैन (आई.ए.एस), भोपाल जुलाई २००८ से अक्टूबर २०१३ तक
        १९. श्री वी.के.जैन, दिल्ली जुलाई,२००८ से अक्टूबर २०१३ तक
        २०. श्री मनोज जैन, धनबाद जुलाई,२००८ से अक्टूबर २०१३ तक
        २१. श्री संतोष जैन पेंढारी, नागपुर २० अक्टूबर २०१३ से २५ फरवरी २०१६ तक
        २२. श्री विनोदकुमार बाकलीवाल, मैसूर
      • मंत्री कालावधि
        २३. श्री खुशाल जैन सी.ए., मुम्बई २० अक्टूबर २०१३ से आज तक
        २४. श्री शरद जैन, भोपाल २० अक्टूबर २०१३ से १५ दि.१८ तक
        २५. श्री वीरेश सेठ, जबलपुर २५ फरवरी २०१६ से १५ दि.१८ तक
        २६. श्री नीलम जैन अजमेरा, उस्मानाबाद १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        २७. श्री विनोद जैन बड़जात्या, रायपुर १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक
        २८. श्री जयकुमार जैन (कोटावाले) जयपुर १५ दिसम्बर २०१८ से आज तक

        सम्मेदाचल का विकास

        साहू शांति प्रसाद जी के कार्यकाल में ही शिखरजी क्षेत्र पर श्वेताम्बर भाईयों के साथ हमारा उग्रतम विवाद चला । उस संकटकाल में श्रीमान् साहूजी की सूझ-बूझ, प्रभाव, धीरज तथा उदारता कमेटी के लिए और समस्त दिगम्बर जैन समाज के लिए, देवी वरदान की तरह महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। उस समय श्वेताम्बरों ने अनेक प्रकार के प्रभाव डालकर, बिहार शासन के साथ, पवित्र सम्मेदाचल पर्वत के संबंध में एकपक्षीय अनुबंध (एग्रीमेन्ट) कर लिया था । साहू शांतिप्रसाद जी ने इसका शक्त विरोध किया।

        Jackson Franco for US

        Ideological Leader ForYouth Generation

        Phasellus finibus ut felis sed suscipit. Donec gravida vel libero ac eleifend. Nullam in justo mattis libero pharetra aliquet nec eget sem. Pellentesque ullamcorper ullamcorper est quis tincidunt. Nullam ut fringilla velit. Nam quis orci ac leo lacinia accumsan quis non dui